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नोबेल पुरस्कार की स्टोरी | Story behind the Nobel Prize in hindi

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Alfred Nobel

Story behind the Nobel Prize in hindi :

Alfred Nobel : नोबेल पुरुस्कार के बारे में तो आपने सुना ही होगा लेकिन आपको जानकर ये ताज्जुब होगा कि जिस व्यक्ति ने नोबेल पुरुस्कार की शुरुवात की थी उसने खुद ने डायनामाईट का अविष्कार किया था |

अल्फ्रेड नोबेल (Alfred Nobel) ने डायनामाईट की तरह ही 300 से अधिक छोटे छोटे उत्पादों का पेटेंट करवाया था और इस तरह से मिलने वाले पैसो से उन्होंने एक फंड बनाया , जो विश्व में अलग अलग क्षेत्रो में महान कार्य करने के लिए प्रोत्साहन पुरुस्कार देता है | नोबेल पुरुस्कार वर्तमान में पुरे विश्व में अलग अलग क्षेत्रो में दिया जाने वाला सबसे बड़ा पुरुस्कार है |

अपना नाम मृतकों की नामावली वाले पेज पर देखकर अचंभित हो गया :

तक़रीबन 160 साल पहले, एक आदमी सुबह का अखबार देख रहा था और अचानक वह अपना नाम मृतकों की नामावली वाले पेज पर देखकर अचंभित और भयभीत हो गया बाद में अखबार ने विवरण में बताया की गलती से किसी गलत इंसान की मृतक घोषित किया गया. लेकिन अखबार देखने के बाद उस आदमी की पहली प्रतिक्रिया देखने योग्य थी. वह यही सोच रहा था की वह यहाँ है या वहा है? और जब विवरण को देखते हुए उसने ओने धैर्य को वापिस प्राप्त किया तब उसके दिमाग में दुसरा विचार यह आया की लोग उसके बारे में क्या सोच रहे होंगे. उस महान व्यक्ति का नाम था ‘अल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल’।

जब लोग मृतकों वाली नामावली वाले पेज पर पढेंगे, “डायनामाइट का राजा मारा गया.” और यह भी की, “वह मृत्यु का सौदागर था.” उस आदमी ने डायनामाइट की खोज की थी और जब उसने ‘मौत का व्यापारी’ ये शब्द पढ़े, तो उसने अपनेआप को ही एक प्रश्न पुछा,

  • “ क्या इसी नाम से मुझे याद किया जायेंगा ? ”

उसने उस समय अपनी भावनाओ को महसूस किया और निश्चय किया की वह इस तरह याद रहने वाला नही बनना चाहता. उसी दिन से, उसने शांति के लिए काम करना शुरू किया. उस आदमी का नाम अल्फ्रेड नोबेल था और आज वह महान नोबेल पुरस्कार के लिए याद किये जाते है.

नोबेल पुरस्कार देकर किसको सम्मानित किया जाता है ? :

1901 से, भौतिक विज्ञानं, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और शांति के क्षेत्र में महान उपलब्धिया प्राप्त करने वाले पुरुष और महिलाओ को नोबेल पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाता है. उस संस्था 1895 में स्थापित की गयी जब अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में लिखा था की, वह अपनी सारी जायदाद नोबेल पुरस्कार देने के लिए छोड़कर जा रहे है.

जैसे अल्फ्रेड नोबेल ने अपनी भावनाओ को महसूस किया था और पुनः अपने गुणों को स्थापित करने की ठानी थी उसी तरह हमें भी अपने आप को प्रश्न पूछना चाहिए और सोचना चाहिए की :

  • आप किस तरह से याद रहना चाहते है?
  • क्या आप अपनेआप को याद करने योग्य बनाना चाहते है?
  • आपकी विरासत क्या है?
  • क्या आप अपनी कमी महसूस कराने वाला बनना चाहते है?

ये कुछ सवाल ऐसे है जो शायद ही हम कभी सोचते हो. लेकिन इस सवाल का जवाब इस एक छोटी सी कहानी में तलाशा जा सकता है. बस सिर्फ हमें अल्फ्रेड नोबेल की ही तरह अपने दिल की आवाज़ को सुनना होंगा की हम जो कर रहे है वह अच्छा है या बुरा? अगर हम चाहते है की लोग हमें एक अच्छे इंसान के रूप में याद रखे तो हमें अपने जीवन में अच्छे काम ही करने चाहिये तभी लोग हमें भले रूप में याद रखेंगे.

दोस्तों जीवन का कोई भरोसा नही है इसलिए जो भी करना है अभी भरपूर समय है अभी कर डालिए, क्योकि

“अच्छे कामो को कल पर टालना सबसे बड़ी मुर्खता कहलाती है.”

अल्फ्रेड नोबेल की मृत्यु और नोबेल पुरुस्कार :

अल्फ्रेड नोबेल (Alfred Nobel) की मृत्यु 10 दिसम्बर 1896 में इटली शहर में हुयी थी | उनकी मौत से पहले उन्होने अपनी वसीयत में लिखा था कि वो करीब 9 मिलियन डॉलर की राशि से एक फंड बनाना चाहते है जो भौतिकी ,रसायन , साहित्य , फिजियोलोजी , मेडिसिन एवं शान्ति आदि के क्षेत्रो में लिए सहायता देगा | मानव जाति की सेवा करने वालो के लिए इस पुरुस्कार की व्यवस्था की गयी | उनकी मृत्यु के पांच वर्ष बाद सन 1901 से प्रथम नोबेल पुरुस्कार वितरित किये गये | नोबेल फाउंडेशन ने पुरुस्कार वितरण का कार्य सम्भाला | तब से नोबेल पुरुस्कार अपने आप में बहुत बड़े सम्मान का विषय माना जाता है |

 

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