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अरुण गवली की जीवनी | Arun Gawli Biography in Hindi

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Arun Gawli
Arun Gawli
नाम अरुण गुलाब अहीर
उपनाम डैडी
जन्म 17 जुलाई, 1955
जन्मस्थान कोपर गावं, अहमदनगर, महाराष्ट्र
पितागुलाबराव
मातालक्ष्मीबाई गुलाब गवली
पत्नी  आशा गवली
पुत्रमहेश गवली
पुत्रीगीता गवली
व्यवसाय राजनीति
नागरिकताभारतीय

 

भारतीय राजनीतिज्ञ अरुण गवली  (Arun Gawli Biography in Hindi) :

अरुण गवली एक भारतीय राजनीतिज्ञ और पूर्व गैंगस्टर है। वह मध्य प्रदेश का मूल निवासी है, लेकिन उसके पिता काम की तलाश में मुंबई के दगडी चौल में आकर बस गए, तब से अरुण गवली और उसका परिवार यही पर रहने लगा। अरुण गवली के माफिया होने के बावजूद भी दगड़ी चौल के लोगों में उसकी काफ़ी लोकप्रियता है। क्योंकि लोग उन्हें अपना एक वफादार दोस्त मानते है। साथ ही अरुण गवली अखिल भारतीय सेना राजनैतिक पार्टी के संस्थापक भी है। Politician Of Arun Gawli

 

प्रारंभिक जीवन (Arun Gawli Early Life) :

अरुण गवली का जन्म 17 जुलाई, 1955 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में हुआ थाअरुण गवली के परिवार में उनके माता पिता और एक भाई भी हैउनके पिता का नाम गुलाबराव है, वह मुंबई के सिम्पलेक्स मिल में काम करते थेऔर माता जी का नाम लक्ष्मीबाई है, तथा भाई का नाम बाप्पा गवली था, गवली के भाई की मृत्यु हो चुकी हैगवली का भतीजा सचिन अहीर पूर्व राज्य गृह मंत्री होने के साथ ही एक विधायक भी हैअरुण गवली के चाचा जिनका नाम हुकुमचंद यादव है, वे मध्य प्रदेश के खंडवा से विधायक है    

 

शिक्षा (Arun Gawli Education) :

1950 के दशक में परिवार की खराब स्थिति के कारण अरुण गवली ने 5 वीं कक्षा तक की शिक्षा प्राप्त की इसके बाद वह आसपास के गाँव में दूध बेचकर अपने परिवार का भरण पोषण करने लगे। Arun Gawli Biography in Hindi

 

निजी जीवन (Arun Gawli Married Life) :

अरुण गवली का करियर (Arun Gawli Criminal Career) :

अरुण गवली ने परेल, चिंचपोकली, बयकुल्ला और कॉटन ग्रीन के मध्य क्षेत्रों में स्थित मुंबई के कपडा मीलों में काम किया1970 में गवली और उसके भाई किशोर ने मुंबई अंडरवर्ल्ड में प्रवेश किया। उसके बाद वो बयकुल्ला कंपनी में शामिल हो गया। और उनके अवैध शराब के कारोबार की निगरानी करने लगा।

1970 से 1980 अंत तक, मुंबई की टेक्सटाइल मील इंडस्ट्री को बहुत सी हडतालो का सामना करना पड़ा था। और परिणामत मिल्स को ताला लगाना पड़ा था। परिणामस्वरूप बहुत से युवा किशोर इससे बेरोजगार हो गये। और इसी वजह से वे लोग पैसे कमाने के शोर्ट-कट को ढूंढने निकले, जिसके चलते वे हफ्ता वसूली जैसा काम करने लगे थे। इसके बाद गवली “बायकुल्ला कंपनी” में शामिल हुए, जिसका नेतृत्व रामा नाइक और बाबू रेशीम करते है।

1984 से 1988 तक, बायकुल्ला कंपनी ने भी दाऊद की स्थानिक क्रिमिनल गतिविधियों में सहायता की, जिसने खुद को पुलिस की गिरफ्त से बचाया था। और खुद दुबई जाकर बस गया था। 1988 के अंत में नाइक पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था। बाद में अरुण गवली ने बायकुल्ला के दगडी चौल में बनी गैंग का कारोबार अपने हातो ले लिया। गवली का ऐसा मानना था, की जिस एनकाउंटर में नाइक की मौत हुई थी, वह योजना दावूद ने ही बनाई थी। और तभी से 1990 में दावूद की डी-कंपनी गैंग और गवली की गैंग के बीच भीषण गैंगवॉर की शुरुवात हो गयी।

गैंग वॉर के समय में गवली की गैंग काफी निर्दयी और खतरनाक थी और इसी वजह से डी-कंपनी के बहुत से गैंगस्टर जैसे शरद शेट्टी, छोटा राजन, छोटा शकील और सौत्या को मुंबई छोड़कर दुबई भागना पड़ा था। इसके बाद गवली के गैंग की भिडंत अमर नाइक और अश्विन नाइक की गैंग से हुई, जो अपनी गैंग को सात रास्ता के लाल विटाची चौल से संभालता था।

मुंबई पुलिस ने कई बार दगडी चौल की बिल्डिंग पर भी रेड डाली और अंत में वे गवली के अंडरवर्ल्ड ऑपरेशन को तोड़ने में सफल भी हुए। क्रिमिनल गतिविधियों के लिए गवली को कई बार गिरफ्तार भी किया गया और कई बार लम्बे समय तक उन्हें जेल में भी रहना पड़ा था। लेकिन बहुत से केसों में पर्याप्त सबुत ना होने की वजह से उन्हें छोड़ दिया जाता था।

अंत में शिवसेना के लीडर कमलाकर जमसंदेकर की हत्या करने के आरोप में वे फस ही गये और कोर्ट ने अगस्त 2012 को उन्हें सजा सुनाई। जमसंदेकर की ह्त्या के आरोप में पुलिस ने गवली और उनके साथ ग्यारह दुसरे लोगो को भी दोषी माना। Arun Gawli Biography in Hindi

 

अरुण गवली की राजनीती (Arun Gawli Politics) :

1980 के दौरान जब पुलिस ने अरुण गवली और साई बानोद जैसे हिन्दू गुंडे के खिलाफ़ करवाई की थी तब उस वक्त शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के द्वारा मुम्बई पुलिस की आलोचना की गयी थी। यह इस बात का प्रतीक था, कि गवली को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था।

1990 के मध्य गवली का शिवसेना से अलगाव हो गया। इसके बाद उसने कई शिवसेना के लोगों की हत्या कर दी, और बाद में अरुण गवली ने खुद की राजनीतिक पार्टी अखिल भारतीय सेना की स्थापना की।

2004 में गवली की नियुक्ती मुंबई के चिंचपोकली निर्वाचन क्षेत्र से अखिल भारतीय सेना के सदस्य के रूप में MLA के पद पर की गयी। कहा जाता है की गवली को स्थानिक लोगो से मिल रही सहायता की वजह से उसकी ताकत दिन प्रति दिन बढती ही जा रही थी। और इसी बात ने गवली को दुसरे मराठी ना बोलने वाले लोगो से थोडा अलग बनाया था।

गवली का राजनीतिक करियर संकट में आ गया था जब उनका भतीजा और पार्टी का विधायक, सचिन अहीर पार्टी से निकलकर उन्ही के विरोध में खड़ा हुआ, और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गया। इतना ही नहीं बल्कि बाद में लोकसभा के चुनाव में अहीर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का टिकट लेकर गवली के खिलाफ चुनाव में भी खड़ा हुआ।

परिणामस्वरूप उन दोनों को हार का सामना करना पड़ा, और जीत शिवसेना की तरफ से लढने वाले एम.पी. मोहन रावले को मिली। गवली की बेटी गीता हाल ही में मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के चुनाव में कॉर्पोरटर के रूप में नियुक्त की गयी।

 

अरुण गवली का विवाद (Arun Gawli Controversy) :

  • 1986 में कोबरा गिरोह के अपराधी सदस्य पारसनाथ पांडये और सशी राशम के मर्डर केश में गिरफ्तारी विवादों में रही थी। 
  • गवली के गैंग के द्वारा शिवसेना के विधायक रमेश मोरे और बाला साहेब ठाकरे के विश्वासपात्र रहे जयंत जाधव और विधायक ज़ौद्दीन बुख़ारी का मर्डर करने के कारण विवादों में रहा। Arun Gawli Biography in Hindi
  • 2007 में गवली ने नगर निगम के शिवसेना के मेयर कमलाकर जमसंदेकर की हत्या के लिए सुपारी देने के आरोप से विवादों में रहे। 

अरुण गवली पर फिल्में (Arun Gawli Movies) :

  • 2015 में अरुण गवली के जीवन पर आधारित मराठी फिल्म ‘दागड़ी चाल’ बनी थी, जिसमे गवली के किरदार को अभिनेता माकरंद देशपांडे ने निभाया था। 
  • 2017 में भी गवली की जिंदगी पर आधारित फ़िल्म “डेडी” बनी थी, जिसमे अभिनेता अर्जुन रामपाल के द्वारा अरुण गवली के किरदार को निभाया था। 

अरुण गवली के बारे में कुछ रोचक बाते (Arun Gawli Unknown Facts) :

अरुण गवली, रमा नाइक और बाबु रेशीम ने मिलकर बायकुल्ला गैंग की शुरुवात की थी, और इन तीनो ने उस समय मुंबई की अंडरवर्ल्ड की दुनिया में राज किया था। मुंबई के बायकुल्ला, परेल, चिंचपोकली, लालबाग और दादर जैसे प्रसिद्ध इलाको पर इसी गैंग का राज था। उस समय दावूद की गैंग डी-कंपनी का विरोध कर उन्हें परास्त करने काफी मुश्किल था, जो गवली की गैंग ने बखूबी करके दिखाया।

अरुण गवली ने मेट्रिक तक ही अपनी पढाई पूरी की है और फिर उसके बाद वे मील में काम करने लगे थे। इसके बाद 1970 में उन्होंने गैंगस्टर सदाशिव पावले से हात मिला लिया। और सामाजिक कार्य करने लगे थे। गवली पहले से ही जुबैदा मुजावर के प्यार में पड़ चूका था। और उनके परिवार के खिलाफ जाकर उन्होंने शादी कर ली थी। शादी के बाद जुबैदा उर्फ़ आशा गवली दगडी चौल की लेडी डॉन बनी। गवली के करीबी बाबु रेशीम और रमा नाइक भी इस शादी से खुश नही थे। लेकिन वे कुछ नही कर सके।

1980 के अंतिम महीनो में गवली का संबंध दावूद से हुआ। ऐसा माना जाता है। की बायकुल्ला गैंग डी-कंपनी की क्रिमिनल गतिविधियों में उनकी सहायता करती थी। लेकिन जब रमा नाइक दावूद के फाइनेंसर शरद शेट्टी के साथ हुए, गंभीर विवाद के बाद उन्होंने दावूद ही सहायता करना बंद कर दिया था। गवली का ऐसा मानना था की नाइक के एनकाउंटर में दावूद का हात था। इसके बाद से दोनों गैंग एक दुसरे के खून की प्यासी हो गयी और आपस में ही एक-दुसरे के दुश्मन बन चुके थे।

1988 के पुलिस एनकाउंटर में रमा नाइक के मारे जाने के बाद गवली ने गैंग की कमान अपने हात में ले ली और दगडी चौल से गैंग को सँभालने लगा था। दावूद की बहन हसीना पारकर के पति इब्राहीम पारकर को अरुण गवली ने ही मार दिया था। इसी गर्मी के चलते बदले की आग में 1990 में दावूद ने गुप्त आदमियों ने गवली के बड़े भाई किशोर की हत्या कर दी थी। कहा जाता है की पारकर की हत्या ही गवली और डी-कंपनी के बीच की दुश्मनी का मुख्य कारण बना।

शिवसेना कॉर्पोरटर कमलाकर जमसंदेकर की हत्या के मामले में दोषी पाए जाने के बाद मुंबई की MCOCA विशेष कोर्ट ने अरुण गवली और उनके साथ 11 दुसरे सहकारियो को भी सजा सुनाई। फ़िलहाल वे मुंबई की तलोजा सेंट्रल जेल में बंद है। दोषी ठहराए जाते समय गवली के उपर 40 अलग-अलग केस पहले से ही दर्ज थे। एक समय था जब शिवसेना गवली की सहायता करती थी।

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने एक रैली में यहाँ तक कह दिया था, की अगर पकिस्तान के पास दावूद है, तो भारत के पास गवली है। लेकिन कुछ वजह से शिवसेना और गवली के रिश्तो में दरार आ गई। गवली ने अखिल भारतीय सेना के नाम से अपनी खुद की पार्टी की स्थापना की और 2004 के चुनाव में चिंचपोकली निर्वाचन क्षेत्र से महाराष्ट्र असेंबली के चुनाव में खड़े भी हुए। इसके बाद चिंचपोकली निर्वाचन क्षेत्र 2008 में बायकुल्ला असेंबली की सीट बना चूका था।

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