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भगिनी निवेदिता की जीवनी | Bhagini Nivedita Biography in Hindi

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Bhagini Nivedita Biography In Hindi
Bhagini Nivedita
नाम मार्गारेट एलिजाबेथ सॅम्युअल नोबल
जन्म        28 अक्तुबर 1867
जन्मस्थान  डंगनॉन टायरान, आयरलैंड
पिता        सॅम्युअल रिचमंड नोबल
माता        मेरी इसाबेल नोबल
विवाह      अविवाहीत
शिक्षा      हॅलीफ़ॅक्स विश्वविद्यालय मे उनकी शिक्षा हुयी।
व्यवसायलेखिका, शिक्षक
पुरस्कारबेस्ट टीचर्स अवार्ड
नागरिकताभारतीय

 

सामाजिक कार्यकर्त्ता भगिनी निवेदिता (Bhagini Nivedita Biography in Hindi) :

भगिनी निवेदिता Bhagini Nivedita एक ब्रिटिश-आइरिश सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका, शिक्षक और स्वामी विवेकानन्द की शिष्या थीं। उनका मूल नाम  ‘मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल’ था। उन्होंने अपना बचपन और युवावस्था का कुछ समय आयरलैंड में बिताया। उन्होंने अपने पिता और शिक्षकों से जीवन के कुछ अमूल्य पाठ सीखे। भगिनी निवेदिता का परिचय स्वामी विवेकानन्द से लन्दन में 1895 में हुआ जिसके बाद वे 1898 में कोलकाता, भारत आ गयीं। उन्होंने न केवल भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन को वैचारिक समर्थन दिया बल्कि महिला शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

 

प्रारंभिक जीवन (Bhagini Nivedita Early Life) :

मार्गरेट एलिज़ाबेथ नोबेल का जन्म 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड के डंगनॉन टायरान में हुआ था। उनके पिता का नाम सैमुअल रिचमंड नोबेल और माता का नाम मैरी इसाबेल था। उनका परिवार स्कॉटलैंड मूल का था पर आयरलैंड में पिछले 5 शताब्दियों से बसा था। जब मार्गरेट मात्र 1 साल की थीं तब उनके पिता धार्मिक शिक्षा के लिए मैनचेस्टर (इंग्लैंड) चले गए और मार्गरेट अपनी नानी के साथ रहीं। जब वे 4 साल की हुईं तब वे अपने पिता के साथ रहने चली गयीं। जब मार्गरेट 10 साल की थीं तब उनके पिता का देहांत हो गया जिसके पश्चात उनकी नानी हैमिलटन ने उनकी देख-रेख की।

 

शिक्षा (Education) :

मार्गरेट ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लन्दन के चर्च बोर्डिंग स्कूल से प्राप्त की। बाद में वे और उनकी बहन हैलिफैक्स कॉलेज में पढने लगे। उस कॉलेज की प्रधानाध्यापिका ने उन्हें जीवन में उपयोगी कई महत्वपूर्ण बातो एवम बलिदान के बारे में सिखाया। निवेदिता कई विषयों का अभ्यास करती थी, जिनमे कला, म्यूजिक, फिजिक्स, साहित्य भी शामिल है। वे 17 साल की उम्र से ही बच्चो को पढ़ाने लगी।

बाद में उन्होंने एक विशाल स्कूल की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश गरीब बच्चो को शिक्षित करना था और समाज का आंतरिक रूप से विकास करना था। भगिनी निवेदिता एक प्रभावशाली लेखिका भी थी जो किसी समाचार पत्र के लिए लेख लिखती थी। और उनके इस तरह के महान कार्य से जल्द ही उनका नाम पुरे लन्दन में प्रसिद्द हो गया। वे अपने समुदाय को छोड़कर दुसरे समुदाय की धार्मिक किताबो को भी पढ़ती थी।

उनका विवाह एक वेल्स मूल के युवक से तय हो गया और सगाई भी हो गयी थी लेकिन सगाई के कुछ ही दिनों बाद वेल्श की मृत्यु हो गयी। नियंत्रित धार्मिक जीवन से उन्हें शान्ति नहीं मिल रही थी इसलिए उन्होंने धर्म पर लिखी पुस्तकें पढना प्रारंभ कर दिया।

 

मार्गरेट और स्वामी विवेकानंद का मिलना (Margaret meets Swami Vivekananda) :

मार्गरेट नोबल नवम्बर 1895 में स्वामी विवेकानंद से मिलीं जब वे अमेरिका से लौटते वक़्त लन्दन में 3 महीने के प्रवास पर थे। मार्गरेट उनसे अपने एक मित्र के निवास पर मिलीं जहाँ वे उपस्थित व्यक्तियों को ‘वेदांत दर्शन’ समझा रहे थे। वे विवेकानंद के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुईं और इसके बाद उनके कई और व्याख्यानों में गयीं।

इस दौरान उन्होंने स्वामी विवेकानंद से ढेरों प्रश्न किये जिनके उत्तरों ने उनके मन में विवेकानंद के लिए श्रद्धा और आदर उत्पन्न किया। इसके बाद मार्गरेट ने गौतम बुद्ध और विवेकानंद के सिद्धांतों का अध्ययन किया जिसका उनके जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। विवेकानंद मार्गरेट के अन्दर सेवा की भावना और उत्साह देख यह समझ गए थे कि वे भारत के शैक्षणिक उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

 

मार्गरेट का भारत आगमन (Bhagini Nivedita Arrival to India) :

स्वामी विवेकानंद के आग्रह पर मार्गरेट अपने परिवार को छोड़ 28 जनवरी 1898 को कोलकता पहुँच गयीं। प्रारंभ में विवेकानंद ने उन्हें भारतीय सभ्यता, संस्कृति, दर्शन, लोग, साहित्य और इतिहास से परिचित करवाया। 11 मार्च 1898 में उन्होंने एक सभा में कोलकाता वासियों का परिचय मार्गरेट अल्वा से करवाया। 17 मार्च को वे रामकृष्ण परमहंस की पत्नी और आध्यात्मिक संगिनी सारदा देवी से मिलीं जिन्होंने उन्हें बेटी कहकर संबोधित किया।

1898 में वे विवेकानंद के साथ हिमालय भ्रमण के लिए गयीं। अल्मोड़ा में उन्होंने पहली बार ध्यान की कला को सीखा। अल्मोड़ा के बाद वे कश्मीर गयीं और फिर अमरनाथ की भी यात्रा की। 1899 में वे स्वामी वेवेकानंद के साथ अमेरिका गईं। Bhagini Nivedita Biography in Hindi

 

ब्रह्मचर्य अंगीकार किया (Bhagini Nivedita Embraced Celibacy) :

जब भगिनी ने 25 मार्च 1898 में स्वामीजी के सामने ब्रह्मचर्या की प्रतिज्ञा ली तभी स्वामी विवेकानंद ने ही उन्हें निवेदिता (भगवान् को समर्पित) का नाम दिया। इस प्रकार भगिनी निवेदिता किसी भी भारतीय पंथ को अपनाने वाली पहली पश्चिमी महिला बनीं। भगिनी निवेदिता ने विवेकानंद के साथ अपने अनुभवों का जिक्र अपनी पुस्तक ‘द मास्टर ऐज आई सॉ हिम’ में किया है। वे अक्सर स्वामी विवेकानंद को ‘राजा’ कहती थीं और अपने आप को उनकी आध्यात्मिक पुत्री।

 

निस्वार्थ सेवा (Bhagini Nivedita Selfless Service) :

स्वामी विवेकानंद से दीक्षा ग्रहण करने के बाद वे स्वामी जी की शिष्या बन गई और रामकृष्ण मिशन के सेवाकार्य में लग गयीं। समाजसेवा के कार्यों में पूर्णरूप से निरत होने के बाद उन्होंने कलकत्ता में भीषण प्लेग के दौरान भारतीय बस्तियों में प्रशंसनीय सुश्रुषा कार्य कर एक आदर्श स्थापित कर दिया। 1898 में उन्होंने कलकत्ता में एक स्कूल की स्थापना की। वहा निवेदिता उन बच्चो को पढ़ना चाहती जिनको कई लोग प्राथमिक शिक्षा से भी दूर रखते थे।

स्वामी विवेकानंद, जोसफिन मक्लोइड और सारा बुल के साथ भगिनी निवेदिता ने कश्मीर समेत भारत के कई हिस्सों का भ्रमण किया और यहाँ के लोगों, इतिहास और संस्कृति को समझा। उन्होंने जागरूकता फ़ैलाने और अपने कार्यों में मदद के लिए अमेरिका का भी दौरा किया। Bhagini Nivedita Biography in Hindi

 

भारतीय स्वतंत्रता में योगदान (Bhagini Nivedita Contribution to Indian Independence) :

भगिनी निवेदिता भारत की स्वतंत्रता की जोरदार समर्थक थीं और अरविंद घोष जैसे राष्ट्रवादियों से उनका घनिष्ठ सम्पर्क था। धीरे-धीरे निवेदिता का ध्यान भारत की स्वाधीनता की ओर गया। विवेकानंद के सिद्धान्तों और आदर्शों का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था, इसलिए उन्होंने विवेकानंद की मृत्यु के बाद संघ से त्यागपत्र दे दिया।

उन्होंने सीधे तौर पर कभी भी किसी राष्ट्रिय आन्दोलन में भाग नहीं लिया, पर उन्होंने भारतीय युवाओं को अपने व्याख्यानों और लेखों के माध्यम से प्रेरित किया। 1905 में राष्ट्रीय कॉग्रेस के बनारस अधिवेशन में उन्होंने भाग लिया।

 

मृत्यु (Bhagini Nivedita Death) :

भगिनी निवेदिता ने 13 अक्टूबर, 1911 को अपना देह त्याग दिया। उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से किया गया। ऐसी अद्भुत नारी, जिसने विदेशी होते हुए भी अपना पूर्ण जीवन भारत की सेवा में बिताया, हम सभी को हेमशा-हेमशा के लिए याद रहेगी। उनका स्मारक रेलवे स्टेशन के नीचे विक्टोरिया फाल्स (दार्जीलिंग) के रास्ते में स्थित है।

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