The Amazing Facts

फ्लोरेंस नाइटिंगेल की जीवनी | Florence Nightingale Biography in Hindi

SHARE
, / 410 0
Florence Nightingale Biography in Hindi
Florence Nightingale
नाम फ्लोरेंस नाइटिंगेल
जन्म 12 मई 1820
जन्मस्थानफ्लोरेंस, ग्रैंड डची ऑफ टस्कैनी
पिताविलियम नाइटिंगेल
माताफ्रांसिस नाइटिंगेल
व्यवसायनर्स और संख्यिकी शास्त्री
नागरिकताब्रिटिश

 

ब्रिटिश नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल (Florence Nightingale Biography in Hindi) :

फ़्लोरेन्स नाइटिंगेल को आधुनिक नर्सिग आंदोलन का जन्मदाता माना जाता है। दया और सेवा की प्रतिमूर्ति फ्लोरेंस नाइटिंगेल “द लेडी विद द लैंप” के नाम से प्रसिद्ध हैं। 1845 में परिवार के तमाम विरोधों और क्रोध के बाद भी उन्होंने अभावग्रस्त लोगों की सेवा का व्रत लिया। दिसंबर 1844 में उन्होंने चिकित्सा सुविधाओं को सुधारने बनाने का कार्यक्रम आरंभ किया था। बाद में रोम के प्रखर राजनेता सिडनी हर्बर्ट से उनकी मित्रता हुई। British Nurse Florence Nightingale

 

प्रारंभिक जीवन (Florence Nightingale Early Life) :

फ्लोरेंस नाइटिंगल का जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस में हुआ था। वह एक अत्यधिक सम्पन्न और समृद्ध परिवार की महिला थीं। वयस्क होने पर उनके मन में नर्स बनकर सेवा करने की ऐसी चाह जागी कि माता-पिता के तीव्र विरोध के बाद भी उन्होंने अपनी यह जिद नहीं छोड़ी। उन्होंने रोम जाकर नर्स को दिये जाने वाले प्रशिक्षण का लाभ उठाया। Florence Nightingale Biography in Hindi

उसके बाद वह पारिवारिक विरोध के बावजूद एक सामाजिक रूढ़िग्रस्त को तोड़ते हुए उन्होंने सेवाभावी संस्था को ज्वाइन कर लिया। वह सम्पूर्ण यूरोप की यात्रा पर गयीं। वहां उन्होंने स्थान-स्थान पर ऐसे लोगों से सम्पर्क किया, जो सेवा की तीव्र इच्छा रखते थे।

 

नर्सिंग जीवन (Florence Nightingale Nursing Life) :

1853 को फ्लोरेंस को जब रोगी महिलाओं की एक संस्था के प्रबंधक का दायित्व सौंपा गया, तो उन्होंने अपने परिश्रम, लगन और कुशल प्रबंधक से इसे इतना विकसित और सुविधायुक्त किया कि उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। 1954 में युद्ध छिड़ गया तब अखबारों में इस आशय की खबरें आने लगीं कि युद्ध में वीर घायल सैनिकों की चिकित्सा के लिए वहां चिकित्सकों और नर्सों की आवश्यकता है।

उस समय के युद्ध मंत्री ने फ्लोरेंस की संस्था की मदद मांगी। फ्लोरेंस ने न केवल अपनी स्वीकृति भेजी, स्वयं सेविकाओं, नर्सों और आवश्यक उपचार सामग्री के साथ वह तुर्की के लिए रवाना हो गयीं। अपनी सेवाकार्य सबंधिक योग्यता के लिए वह इतनी अधिक प्रसिद्ध हो गयी थीं कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में अनुदान भी मिला। हालांकि उनके कार्यों की आलोचना भी हुई। तथापि इस कार्य में फ्लोरेंस का कर्तव्यनिष्ठा से किया गया सेवाभाव काम आया।

युद्ध में आये घायल सिपाहियों की संख्या 600 से अधिक थी। वहां सरकारी अफसरों का भ्रष्टाचार नाइटिंगल के कार्य में एक बड़ी बाधा बन रहा था। तथापि फ्लोरेंस ने इन सबकी चिंता न करते हुए खाना बनवाने, सफाई, कपड़े धुलवाने, सामानों की देखभाल सहित लगभग 20 घंटे प्रतिदिन काम किया। सब कार्य खत्म होने के बाद वह रात्रि के समय एक बार मरीजों के पास जाकर उनका हालचाल जरूर पूछती थीं।

उनकी मृदुल वाणी उपचार का काम करती थी। लैम्प लेकर वह अपनी सफेद टोपी और काली फ्रॉक में सेवा की साक्षात मिसाल लगती थीं। सैनिकों ने उन्हें ‘लेडी ऑफ द लैंप’ की उपाधि दी। उन्होंने उस समय घायल सैनिकों के मनोरंजनार्थ पुस्तकों, खेलों आदि की भी व्यवस्था करवायी। Lady of the Lamp

उन्होंने युद्ध के घायल सैनिकों के लिए ताजे भोजन आदि की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखा। वह युद्ध के मैदान में जाती थीं। अत्यधिक मेहनत के कारण वह भयंकर ज्वर से पीड़ित हो गयी थीं, जिसकी वजह से वह दुर्बल भी हो गयी थीं। वह दुबारा स्वस्थ हुईं, तो महारानी विक्टोरिया ने उन्हें व्यक्तिगत तौर पर धन्यवाद दिया। पूरे राष्ट्र ने उनका अभिनंदन किया।

इस तरह फ्लोरेंस ने अपने इस कार्य को आजीवन जारी रखा। युद्ध में उनकी महत्त्वपूर्ण सेवाओं के लिए इंग्लैण्ड के निवासियों ने उनके नाम पर 50,000 पाउण्ड एकत्र किये थे। उस राशि को उन्होंने सेंट टॉमस अस्पताल में नर्सों को प्रशिक्षण देने के लिए “नाइटिंगल होम” की स्थापना की।

फ्लोरेंस नाइटिंगल ने युद्ध के घायल सैनिकों के तुरंत उपचार की जो परंपरा स्थापित की, उसके लिए उन्हें इंग्लैण्ड की महारानी द्वारा 1907 को “आयीर ऑफ मेडिट” का अलंकरण प्रदान किया गय। 1908 में उन्हें ‘फ्रीडम ऑफ द सिटी ऑफ लंदन’ की उपाधि प्रदान की गयी। फ्लोरेंस ने नर्सों के प्रशिक्षण के लिए सेंट टॉमस अस्पताल में नाइटिंगल होम के अलावा 1850 में 800 पृष्ठों की एक रिपोर्ट प्रकाशित की।

नोट्‌स ऑर मेट्‌स अफेटिंग द हेल्थ, ”इफिंक्टिसिटी एण्ड हॉस्पिटल एडमीनिस्ट्रिशन ऑफ द ब्रिटिश आर्मी”, इसमें ब्रिटिश के स्वारथ्य सम्बन्धी जानकारी के लिए स्वतन्त्र आयोग का गठन किया गया। फ्लोरेंस भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान भारत आना चाहती थीं, जिसकी अनुमति उन्हें नहीं मिल पायी। Social Worker Florence Nightingale

 

मृत्यु (Florence Nightingale Death) :

फ्लोरेंस नाइटिंगल की मृत्यु 90 वर्ष की उम्र में 13 अगस्त, 1910 में लन्दन में हुई। Florence Nightingale Biography in Hindi

_

कहानी से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें Facebook पर ज्वॉइन करें…

Leave A Reply