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लक्ष्मी सहगल की जीवनी | Lakshmi Sahgal Biography in Hindi

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Lakshmi Sahgal
Lakshmi Sahgal
नाम लक्ष्मी सहगल
दूसरा नाम कप्तान लक्ष्मी सहगल
जन्म 24 अक्टूबर 1914
जन्मस्थान मद्रास, ब्रिटिश भारत
पितासुब्बारमा स्वामीनाथन
माताअम्मू स्वामीनाथन
पति प्रेम कुमार सहगल (1947-1992)
पौत्र  शाद अली (फिल्म निर्माता)
बेटी सुभाषिनी अली, अनीसा पुरी
शिक्षा एम.बी.बी.एस और प्रसूति में डिप्लोमा
व्यवसायवकील
पुरस्कारपद्म विभूषण
नागरिकताभारतीय

 

भारतीय स्वतंत्रता की क्रांतिकारी “लक्ष्मी सहगल” (Lakshmi Sahgal Biography in Hindi) :

लक्ष्मी सहगल का दूसरा नाम लक्ष्मी स्वामीनाथन भी है। भारतीय स्वतंत्रता अभियान की एक क्रांतिकारी और भारतीय राष्ट्रिय सेना की अधिकारी साथ ही आज़ाद हिंद सरकार के विमेंस अफेयर्स की मिनिस्टर थी। सहगल को भारत में साधारणतः “कप्तान सहगल” के नाम से भी जानी जाती है। यह उपनाम उन्हें तब दिया गया। जब द्वितीय विश्व युद्ध के समय बर्मा में उन्हें कैद करके रखा गया था। Great revolutionary Of Lakshmi Sahgal

 

प्रारंभिक जीवन (Lakshmi Sahgal Early Life) :

लक्ष्मी सहगल का जन्म लक्ष्मी स्वामीनाथन के नाम से 24 अक्टूबर, 1914 को मद्रास प्रांत के मालाबार में हुआ था। उनके पिता एस. स्वामीनाथन एक वकील और माँ ए.व्ही. अम्मू स्वामीनाथन एक सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी थी। जन्म के समय उनके पिता मद्रास उच्च न्यायालय में क्रिमिनल लॉ का अभ्यास कर रहे थे। Lakshmi Sahgal Biography in Hindi

 

शिक्षा (Lakshmi Sahgal Education) :

लक्ष्मी सहगल ने मेडिकल की पढाई कर 1938 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से M.B.B.S की डिग्री प्राप्त की। इसके एक साल बाद उन्होंने स्त्री रोग और प्रसूति में डिप्लोमा हासिल कर लिया। चेन्नई में स्थापित सरकारी कस्तूरबा गाँधी अस्पताल में वह डॉक्टर का काम करती थी।

 

लक्ष्मी सहगल की निजी जिंदगी (Lakshmi Sahgal Personal Life) :

लक्ष्मी सहगल ने मार्च 1947 में लाहौर में प्रेम कुमार सहगल से शादी कर ली थी। उनकी शादी के बाद वे कानपूर में बस गये, उनको दो बेटियां थी, जिसका नाम सुभाषिनी अनीसा था। जहाँ लक्ष्मी मेडिकल का अभ्यास करने लगी, और बटवारे के बारे भारत आने वाली शर्णार्थियो की भी सहायता करती थी। Lakshmi Sahgal Biography in Hindi

एक डॉक्टर की हैसियत से वे सिंगापुर गईं थीं, लेकिन 98 वर्ष की उम्र में वे अब भी कानपुर के अपने घर में बीमारों का इलाज करती हैं। आज़ाद हिंद फ़ौज की रानी झाँसी रेजिमेंट में लक्ष्मी सहगल बहुत सक्रिय रहीं। बाद में उन्हें कर्नल का ओहदा दिया गया। लेकिन लोगों ने उन्हें कैप्टन लक्ष्मी के रूप में ही याद रखा।

एक बेटी सुभाषिनी ने फ़िल्म निर्माता मुजफ्फर अली से विवाह किया। सुभाषिनी अली 1989 में कानपुर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद भी रहीं। सुभाषिनी अली ने कम्युनिस्ट नेत्री बृन्दा करात की फ़िल्म ‘अमू’ में अभिनेत्री का किरदार भी निभाया था। डॉ. सहगल के पौत्र और सुभाषिनी अली और मुज़फ्फर अली के पुत्र शाद अली फ़िल्म निर्माता निर्देशक हैं, जिन्होंने ‘साथिया’, ‘बंटी और बबली’ इत्यादि चर्चित फ़िल्में बनाई हैं। प्रसिद्ध नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई उनकी सगी बहन हैं।

 

लक्ष्मी सहगल का करियर (Lakshmi Sahgal Political career) :

उसके पति की मौत के बाद लक्ष्मी कानपुर आकर रहने लगीं, और बाद में सक्रिय राजनीति में भी आयीं। 1971 में वह मर्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी/ माकपा (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इण्डिया सीपीआईएम) की सदस्यता ग्रहण की और राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। वे अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (ऑल इण्डिया डेमोक्रेटिक्स वोमेन्स एसोसिएशन) की संस्थापक सदस्यों में रहीं।

बांग्लादेश विवाद के समय उन्होंने कलकत्ता में बांग्लादेश से भारत आ रहे, शरणार्थीयो के लिए बचाव कैंप और मेडिकल कैंप भी खोल रखे थे। 1981 में स्थापित ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन की वह संस्थापक सदस्या है। और इसकी बहुत सी गतिविधियों और अभियानों में उन्होंने नेतृत्व भी किया है।

लक्ष्मी ने महिलाओं की सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता के लिए काफ़ी संघर्ष किया। वर्ष 2002 में 88 वर्ष की आयु में उनकी पार्टी (वाम दल) के लोगों के दबाव में उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव मैदान में भी उतरी लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन उनकी प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आई।

एक लम्बे राजनीतिक जीवन को जीने के बाद 1997 में वह काफ़ी कमज़ोर हो गयीं। उनके क़रीबी बताते हैं कि शरीर से कमज़ोर होने के बाद भी कैप्टन सहगल हमेशा लोगों की भलाई के बारे में सोचती थीं तथा मरीजों को देखने का प्रयास करती थीं।

 

नेताजी सुभाषचंद्र बोस से मुलाकात (Lakshmi Sahgal Met Subhash Chandra Bose) :

विदेश में मज़दूरों की हालत और उनके ऊपर हो रहे जुल्मों को देखकर उनका दिल भर आया। उन्होंने निश्चय किया, कि वह अपने देश की आजादी के लिए कुछ करेंगी। लक्ष्मी के दिल में आजादी की अलख जग चुकी थी, इसी दौरान देश की आजादी की मशाल लिए नेता जी सुभाष चन्द्र बोस ने 2 जुलाई, 1943 को सिंगापुर आए तो डॉ. लक्ष्‍मी भी उनके विचारों से प्रभावित हुए, बिना नहीं रह सकीं और अंतत: क़रीब एक घंटे की मुलाकात के बीच लक्ष्मी ने यह इच्छा जता दी, कि वह उनके साथ भारत की आजादी की लड़ाई में उतरना चाहती हैं।

लक्ष्मी के भीतर आज़ादी का जज़्बा देखने के बाद नेताजी ने उनके नेतृत्व में ‘रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट‘ बनाने की घोषणा कर दी, जिसमें वह वीर नारियां शामिल की गयीं, जो देश के लिए अपनी जान दे सकती थीं। 1943 में डॉ. लक्ष्मी ने रानी झाँसी रेजिमेंट में ‘कैप्टन’ पद पर कार्यभार संभाला। अपने साहस और अद्भुत कार्य की बदौलत बाद में उन्हें ‘कर्नल‘ का पद भी मिला, जो एशिया में किसी महिला को पहली बार मिला था। लेकिन लोगों ने उन्हें ‘कैप्टन लक्ष्मी‘ के रूप में ही याद रखा।

 

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान (Lakshmi Sahgal Contribution to freedom struggle) :

कप्तान लक्ष्मी सहगल भारत की अब तक की, सबसे सफल महिलाओं में से एक है। लक्ष्मी सहगल ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित ‘आजाद हिंद फौज (आईएनए)’ के लिए अपने हाथों में गन थामी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक शेरनी की भांति लड़ीं। Lakshmi Sahgal Biography in Hindi

1942 में जब ब्रिटिशो ने सिंगापुर को जापानियों को सौप दिया, तब सहगल ने युद्ध में घायक कैदियों की सहायता की, जिनमे से बहुत से लोग भारतीय स्वतंत्रता सेना के निर्माण में इच्छुक थे। सिंगापुर में उस समय बहुत से सक्रीय राष्ट्रिय स्वतंत्रता सेनानी जैसे के.पी. केसव मेनन, एस.सी. गुहा, और एन. राघवन इत्यादि थे। जिन्होंने कौंसिल ऑफ़ एक्शन की स्थापना की। उनकी आज़ाद हिंद फ़ौज ने युद्ध में शामिल होने के लिए जापानी सेना की अनुमति भी ले रखी थी।

इसके बाद 2 जुलाई, 1943 को सुभास चंद्र बोस का आगमन सिंगापुर में हुआ। आने वाले दिनों में उनकी सभी सामाजिक सभाओ में बोस महिलाओ को आगे बढ़ाने के उनके संकल्प के बारे में बोलते थे। जिसमे वे उनसे कहते थे, की“देश की आज़ादी के लिए लड़ो और आज़ादी को पूरा करो।

जब लक्ष्मी ने देखा की बोस महिलाओ को अपनी संस्था में शामिल करना चाहते है, तो उन्होंने बोस के साथ सभा निश्चित करने की प्रार्थना की और महिलाओ के हक़ में उन्होंने झाँसी की रानी रेजिमेंट की शुरुवात की, अपनी सेना में डॉ. लक्ष्मी स्वामीनाथन “कप्तान लक्ष्मी” के नाम से जानी जाती थी, और उन्हें देखकर आस-पास की दूसरी महिलाये भी इस सेना में शामिल हो चुकी थी।

इसके बाद भारतीय राष्ट्रिय सेना ने जापानी सेना के साथ मिलकर दिसम्बर, 1944 में बर्मा के लिए आंदोलन किया। लेकिन युद्ध के दौरान मई, 1945 में ब्रिटिश सेना ने कप्तान लक्ष्मी को गिरफ्तार कर लिया, और भारत भेजे जाने से पहले मार्च, 1946 तक उन्हें बर्मा में ही रखा गया था। 1971 में सहगल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) में शामिल हो गयी, और राज्य सभा में भी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने लगी। बांग्लादेश विवाद के समय उन्होंने कलकत्ता में बांग्लादेश से भारत आ रहे शरणार्थीयो के लिए बचाव कैंप और मेडिकल कैंप भी खोल रखे थे।

1981 में स्थापित ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन की वह संस्थापक सदस्या है। और इसकी बहुत सी गतिविधियों और अभियानों में उन्होंने नेतृत्व भी किया है। 1984 में हुए, भोपाल गैस कांड में वे अपने मेडिकल टीम के साथ पीडितो की सहायता के लिए भोपाल पहुची। 1984 में सिक्ख दंगो के समय कानपूर में शांति लाने का काम करने लगी।

1996 में बैंगलोर में मिस वर्ल्ड कॉम्पीटिशन के खिलाफ अभियान करने के लिए उन्हें गिरफ्तार किया गया था। 92 साल की उम्र में 2006 में भी वह कानपूर के अस्पताल में मरीजो की जाँच कर रही थी। Lakshmi Sahgal Biography in Hindi

 

2002 में पार्टी :

  • कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया
  • दी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी)
  • क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी
  • ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक

इन चारो पार्टयों ने सहगल का नामनिर्देशन राष्ट्रपति चुनाव के लिए भी किया। उस समय राष्ट्रपति पद के उम्मेदवार ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की वह एकमात्र विरोधी उम्मेदवार थे।

 

लक्ष्मी सहगल के अवार्ड  (Lakshmi Sahgal Award) :

  • 1998 में सहगल को भारत के राष्ट्रपति के.आर.नारायण ने “पद्म विभूषण” अवार्ड से सम्मानित किया था।

मृत्यु  (Lakshmi Sahgal Death) :

19 जुलाई, 2012 को एक कार्डिया अटैक आया और 23 जुलाई, 2012 को सुबह 11:20 AM पर 97 साल की उम्र में कानपूर में उनकी मृत्यु हो गयी। उनके पार्थिव शरीर को कानपूर मेडिकल कॉलेज को मेडिकल रिसर्च के लिए दान में दिया गया। 

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