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महात्मा गांधी की जीवनी | Mahatma Gandhi Biography in Hindi

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Mahatma Gandhi
Mahatma Gandhi
नाम मोहनदास करमचंद गांधी
जन्म        2 अक्तुंबर 1869
जन्मस्थान  पोरबंदर, गुजरात में
पिता        करमचंद
माता        पुतलीबाई
पत्नीकस्तूरबा गांधी
पुत्रहरिलाल, मणिलाल, देवदास, रामदास
शिक्षा      इग्लंड में बॅरिस्टर
व्यवसायराजनीतिज्ञ, क्रांतिकारी
राष्ट्रीयताभारतीय

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi Biography in Hindi) :  

महात्मा गांधी के नाम से प्रख्यात मोहनदास करमचंद गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनीतिक नेता थे। सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतो पर चलकर उन्होंने भारत को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अहिंसक सिद्धांतों ने पूरी दुनिया में लोगों को अपने अधिकारों और स्वतन्त्रता आंदोलन के लिये लड़ने के लिए प्रेरित किया। महात्मा गांधी को भारत के राष्ट्रपिता भी कहा जाता है। यह नाम सुभाष चन्द्र बोस ने 1944 में रंगून रेडियो से गांधी जी को ‘राष्ट्रपिता’ कहकर सम्बोधित किया था। Mahatma Gandhi Chief Political Leader of Indian Independence Movement

प्रारंभिक जीवन (Mahatma Gandhi Early Life) :

मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म गुजरात के पोरबंदर में 2nd अक्तुबर 1869 को हुआ था। मोहनदास गांधी के पिता का नाम करमचंद गांधी था, वे ब्रिटिश समय में एक छोटे से राज्य के दीवान थे। मोहनदास गांधी के माता का नाम पुतलीबाई था। वे करमचंद जी की चौथी पत्नी थी। मोहनदास गांधी बचपन में अपनी माता के साथ रहते हुए उनमें दया, प्रेम, और ईश्वर के प्रति श्रद्धा बचपन में ही थी।

शादी (Mahatma Gandhi Marriage) :

मोहनदास गांधी जब 14 वर्ष के थे तब उनकी शादी कस्तूरबा माखनजी से हो गयी। गांधीजी कस्तूरबा से उम्र में 1 वर्ष से छोटे थे। उनकी चार संतान हुए जिनमे हरीलाल गांधी (1888), मणिलाल गांधी (1892), रामदास गांधी (1897) और देवदास गांधी (1900) थे।

शिक्षा (Mahatma Gandhi Education) :

मोहनदास गांधी की पाठशाला की शिक्षा पोरबंदर में हुई और उन्होंने 1887,अहमदाबाद में मैट्रिक की परीक्षा पास की। इसके बाद मोहनदास ने भावनगर आये और उन्होंने शामलदास कॉलेज में एडमिशन लिया पर स्वास्थ्य ठीक न होने और रहनेमें समस्या के कारण वह दुखी ही रहे और कॉलेज छोड़कर पोरबंदर वापस आ गए। Father of the Nation Mahatma Gandhi

लंदन में शिक्षा और वकालत (Mahatma Gandhi Advocacy in London) :

मोहनदास गाँधी 1888, लन्दन में में यूनिवर्सिटी कॉलेज में कानून की पढाई करने और वकील बनने के लिये इंग्लैंड गये और वहां उन्हें काफी मुस्किले भी हुई, जैसे की शाकाहारी खाने से सम्बंधित बहुत कठिनाई हुई और शुरूआती दिनो में कई बार उन्हें भूखे ही रहना पड़ता था फिर वे धीरे-धीरे शाकाहारी भोजन वाले रेस्टोरेंट्स के बारे में पता लगा लिया।

इसके बाद उन्होंने व्हकि “वेजिटेरियन सोसाइटी” में भी रहना सुरु कर दिया। इस सोसाइटी के सदस्य ने मोहनदास गांधी को गीता पढने का सुझाव दिया। उसके बाद वे जून 1891 में मोहनदास गांधी भारत लौट आये और वहां जाकर उन्हें अपनी माता जी के मृत्यु के बारे में पता चला, ये सुनकर उन्हें काफी दुःख हुआ और उसके बाद उन्होंने बॉम्बे में वकालत की शुरुआत की, पर उन्हें उसमे कुछ खास सफलता नहीं मिली।

इसके बाद वे राजकोट चले गए जहाँ उन्होंने काफी जरूरत मंद लोगो के लिये केश की अर्जियाँ लिखने का काम शुरू कर दिया पर कुछ समय बाद उन्हें ये काम भी छोड़ना पड़ा। इसके बाद आख़िरकार 1893 में एक भारतीय कंपनी से दक्षिण अफ्रीका में एक वर्ष के करार पर वकालत कार्य का स्वीकार कर लिया। Mahatma Gandhi Biography in Hindi

गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में (Mahatma Gandhi in South Africa) :

मोहनदास गाँधी 24 साल के थे तब दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहा वे कुछ भारतीय लोगो और व्यापारि के साथ गए थे। वहा वे न्यायिक सलाहकार के रूप में गए थे। गाँधीजी ने अपने जीवन के 21 साल दक्षिण अफ्रीका में गुज़ारे और वहा के लोगो को अहिंसा के लिए प्रेरित भी किया और खुद में भी काफी विचार और नेतृत्व कौशल का विकास किया।

मोहनदास गाँधीजी को दक्षिण अफ्रीका में जाती के भेद-भाव का बहुत ज्यादा विरोध करना पड़ा था। एक बार कुछ ऐसा हो गया जिससे गांधीजी का जीवन का लक्ष ही बदल गया। एक बार ट्रेन में प्रथम श्रेणी टिकट होने के बाद उन्हें तीसरी श्रेणी के डिब्बे में जाने के लिए कहा परंतु इससे इंकार करने के कारण उन्हें ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। ऐ घटनाएँ उनके के जीवन की महत्वपूर्ण घुमाव पर लेन वाली थी और सामाजिक और राजनीतिक अन्याय के प्रति आवाज़ उठाने का कारण बनीं।

गाँधी जी ने दक्षिण अफ़्रीकी सरकार के सामने भारतियों की नागरिकता सम्बंधित मुद्दे को भी रखा इसके बाद 1906 के ज़ुलु युद्ध के के समय भारतीयों को युद्ध में शामिल करने के लिए ब्रिटिश सरकार को प्रभावित किया। गांधीजी के अनुसार अपनी नागरिकता के दावे के लिए भारतीयों को युद्ध में साथ देना चाहिए।

स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष (Mahatma Gandhi Struggle For Freedom) :

इसके बाद महात्मा गांधी 1914 में भारत वापस लौट आये और गांधी जी इस समय तक एक वे एक राष्ट्रवादी नेता बनकर सामने आ चुके थे। वह वापस भारत कांग्रेस नेता गोपाल कृष्ण गोखले के कहने से आये थे और शुरूआती समय में गांधीजी के विचार काफी हद तक गोपाल कृष्ण गोखले के विचारों से प्रभावित थे। शुरुआत में गांधीजी ने देश के अलग-अलग भागों की यात्रा कि। इसके बाद राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक समस्या को समझने की और उसे हल करने की कोशिश की।

चंपारण आंदोलन (Mahatma Gandhi on Champaran Movement) :

गांधीजी को भारत में पहली राजनीतिक सफलता बिहार के चंपारण और गुजरात के खेड़ा में हुए आंदोलनों ने दिलाई। चंपारण में ब्रिटिश सरकार किसानों को खाद्य फसलों की बजाए नील की खेती करने के लिए मजबूर करते थे और सस्ती कीमत पर उनकी फसल खरीदते थे जिससे किसानों की स्थिति बदतर होती जा रही थी।

इस कारण वे दिन पर दीन गरीबी का शिकार हो रहे थे। इसके बाद एक बहुत बड़ी अकाल अकाल की स्थिति जा गयी और ऊपर से अंग्रेजी सरकार ने दमनकारी कर लगा दिया , जो दिन प्रतिदिन बढता ही गया। कुल मिलाकर स्थिति बहुत गंभीर हो गयी थी। इसके बाद गांधीजी ने जमींदारों के सामने आवाज़ उठाई और विरोध प्रदर्शन करते हुए हड़तालों का नेतृत्व किया, जिसके बाद गरीब किसानों की मांगों को माना गया।

खेड़ा सत्याग्रह (Mahatma Gandhi on Kheda Satyagraha) :

गुजरात में 1918 में खेड़ा में बहोत सूखा छा गया। जिसके कारण किसान और गरीबों की स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ती चली गयी और कर माफ करने की मांग करने लगे। खेड़ा में गांधीजी और सरदार पटेल के मार्गदर्शन में अंग्रेजों के साथ इस समस्या पर विचार करने के बाद किसानों के पक्ष में निर्णय आया। इसके बाद अंग्रेजों ने राज्य में जिसको भी कैद करके रखा था इन्हे आज़ाद कर दिया। इस प्रकार चंपारण और खेड़ा जिले के आंदोलन के बाद गांधीजी पुरे देश भर में प्रख्यात हो गई और वे स्वतंत्रता आंदोलन के एक महत्वपूर्ण नेता बनकर सामने आये।

खिलाफत आंदोलन (Mahatma Gandhi Khilafat Movement) :

गांधीजी को खिलाफत आंदोलन के जरिये कांग्रेस में और मुसलमो के बीच अपना विश्वास और लोकप्रियता बढ़ाने का मौका मिला। खिलाफत आंदोलन एक सर्वव्यापक आंदोलन था जिसके द्वारा खलीफा के गिरते शाशन का विरोध पूरी दुनिया के मुसलमानों द्वारा किया जा रहा था। प्रथम विश्व युद्ध में हार का सामना करने के बाद ओटोमन साम्राज्य समाप्त करर दिया था जिसके कारण मुसलमानों को अपना धर्म और धार्मिक स्थल के सुरक्षा को लेकर चिंता होने लगी थी। 

भारत में खिलाफत का आंदोलन का संचालन “ओल इंडिया मुस्लिम कॉफ्रेस” के द्वारा किया जा रहा था, धीरे-धीरे गांधी जी इसके मुख्य नेता बन गए। भारतीय मुसलमान को साथ लाने के लिए उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दिए गए सभी सम्मान और मैडलों को वापस कर दिया। इसके बाद गांधीजी सिर्फ कांग्रेस के ही नहीं बल्कि देश के एकमात्र ऐसे नेता बन गए जिसका प्रभाव विभिन्न ज्ञाति के लोगों पर था।

असहयोग आंदोलन (Mahatma Gandhi Non-Cooperation Movement) :

गांधी जी का ये मानना था की भारत में अंग्रेजी हुकुमत इसलिए संभव हो पाया क्योंकी खुद भारतियों ने ही उनकी मदद की है और अगर हम सब मिलकर एकसाथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़े तो आजादी मुमकिन है। गांधीजी धीरे धीरे प्रख्यात हो रहे थे उसी समय उनकी बढती लोकप्रियता ने उन्हें कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता बना दिया था और अब वह इस स्थिति में थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध असहयोग आंदोलन का प्रयोग करर सके।

इसी बीच जलियावांला बाग़ के कांड पुरे देश खलबली मचा डाली थी। जिसके कारण जनता में काफी गुस्सा और हिंसा की अग्नि भड़क उठी थी। गांधीजी ने स्वदेशी नीति का आह्वान किया जिसमें सभी विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना था।

असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया (Gandhiji withdrew Non-cooperation movement) :

गांधीजी को असहयोग आंदोलन को बहुत सफलता मिल रही थी लेकिन इस आंदोलन का अंत फरवरी 1922 चौरी-चौरा कांड के साथ हुआ। गाँधी जी पर राजद्रोह का इंजाम लगाया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया जिसमें उन्हें 6 साल की जेल की सजा सुनाई गयी लेकिन स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से उन्हें जेल से रिहा कर दिया।

इसके बाद दिसम्बर 1928 के कलकत्ता अधिवेशन में गांधीजी ने अंग्रेजो को अपनी हुकुमत छोड़कर भारतीयों को सत्ता को प्रदान करने के लिए कहा लेकिन अंग्रेजों द्वारा कोई जवाब नहीं मिलने पर पहेली बार 31 दिसम्बर 1929 को लाहौर में भारत का राष्ट्र ध्वज फहराया गया और कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 के दिन भारतीय स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया।

साइमन कमीशन का विरोध (Gandhiji Opposition to Simon Commission) :

महात्मा गांधी जी 1928 तक राजनीति ज्यादातर से दूर ही रहे। इस दौरान वे स्वराज पार्टी और कांग्रेस पार्टी के बीच चल रहे झगड़े को कम करने की कशिश में लगे रहे और इसके चलते अस्पृश्यता, शराब, अज्ञानता और गरीबी का विरोध करते रहे। उस समय अंग्रेजी सरकार ने जॉन साइमन के संचालन में भारत के लिए एक नया संवेधानिक सुधार आयोग ‘साइमन कमीशन’ बनाया। इसका एक भी सदस्य भारतीय नहीं था जिसके कारण भारतीय लोगो और राजनैतिक दलों ने साइमन कमीशन का विरोध प्रदसन किया था।

नमक सत्याग्रह (Mahatma Gandhi Namak Satyagraha) :

इसके बाद गांधी जी ने सरकार द्वारा नमक पर ज्यादा कर लगाया जा रहा था। गांधीजी ने इसके सामने विरोध प्रगट करते हुऐ दांडी सत्याग्रह किया जिसके चलते उन्होंने 12 मार्च से 6 अप्रेल तक अहमदाबाद से दांडी, गुजरात तक करीब 388 की.मि. का सफर किया। Mahatma Gandhi Biography in Hindi

इस यात्रा का मुख्य ध्येय था की गाँधी जी चाहते थे की भारतीय लोग खुद नमक का उत्पादन करे। इस यात्रा में हजारों भारतीय लोगो ने भाग लिया और अंग्रेजी सरकार को विचलित करने में कामयाब रहे। इस आंदोलन के चलते अंगेजी सरकार ने लगभग 60 हज़ार या उससे अधिक लोगों को गिरफ्तार कर लिया और जेल की सजा सुना दी।

गांधी-इरविन संधि (Gandhi-Irwin Pact) :

इसके बाद सर इरविन के प्रतिनिधित्व वाली सरकार ने गांधीजी के साथ बात कर के और विचार कर के गांधी-इरविन समझोते पर मार्च 1931 में हस्ताक्षर हुए। गांधी-इरविन संधि के के चलते ब्रिटिश सरकार ने सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया।

इस समझौते के परिणाम के चलते गांधीजी को लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने का मौका मिल, परंतु यह सम्मेलन में कांग्रेस और दूसरे राष्ट्रवादियों के लिए घोर निराशाजनक रहा। इसके बाद फिर से गांधीजी को गिरफ्तार कर लिए गया और सरकार ने राष्ट्रवादी आंदोलन को नस्ट करने की कोशिश की। Mahatma Gandhi Biography in Hindi

कांग्रेस से इस्तीफ़ा (Mahatma Gandhi Resign from Congress) :

गांधीजी ने 1934 में कांग्रेस की सभ्यता से त्यागपत्र दे दिया था। उसके बाद वे ग्रामीण विस्तार में शिक्षण पहुंचा ने की कोशिश करने लगे और साथ ही साथ कताई, बुनाई और अन्य घर उद्योगों को प्रोत्साहन देने लगे और लोगों की जरुरत के हिसाब से अनुकूल शिक्षण स्यावस्था बनाने का काम शुरू किया। Mahatma Gandhi Biography in Hindi

हरिजन आंदोलन (Mahatma Gandhi Harijan Movement) :

डॉ भीमराव आंबेडकर एक दलित नेता की कोशिशों में अंग्रेजी सरकार ने अछूतों के लिए एक नए संघटन के चलते अलग निर्वाचन मंजूर कर दिया था। तब उस वक्त गांधीजी येरवडा जेल में बंद थे तब इसके विरोध में गांधीजी ने 1932 में 6 दिन का उपवास किया। ये दलित लोगो के जीवन को सुधारने के लिए गांधीजी के द्वारा चलाए गए अभियान की शुरूआत थी।

गांधीजी ने 8 मई 1933 को 21 दिन का उपवास किया और एक ‘हरिजन आंदोलन’ नामक एक आंदोलन को आगे बढ़ाया जो एक वर्ष के लिए था और उस अभियान की शुरुआत की। आंबेडकर इस आंदोलन से खुस नहीं थे और गांधीजी द्वारा दलितों के लिए हरिजन शब्द का उपयोग करने के लिए निंदा की। Mahatma Gandhi Biography in Hindi

भारत छोड़ो आंदोलन (Mahatma Gandhi Quit India Movement) :

द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में गांधी जी अंग्रेजों को ‘अहिंसात्मक नैतिक सहयोग’ देने के लिए एकसार थे परंतु कांग्रेस कई नेता इस बात से ज्यादा खुश नहीं थे कि जनता के प्रतिनिधियों की सलाह लिए बिना ही सरकार ने देश को युद्ध में फेक दिया। गांधीजी ने घोषणा पत्र जाहेर किया की “एक तरफ भारत को आजादी देने से मना किया जा रहा है और दूसरी तरफ भारत को युद्ध में शामिल किया जा रहा है”।

जैसे-जैसे द्रितीय विश्व युद्ध बढता गया गांधीजी और कांग्रेस ने 1942 में “भारत छोड़ो आंदोलन” की मांग को बढ़ा दिया। बाद में धीरे धीरे “भारत छोड़ो स्वतंत्रता आंदोलन” संघर्ष का सबसे शक्तिशाली आंदोलन बन गया। इस आंदोलन में हजारों की तादात में लोग या तो मारे गए या घायल हो गए और कई सरे गिरफ्तार कर जेल की सजा भी सुनाई गयी। Mahatma Gandhi Biography in Hindi

गांधीजी ने यह पक्का कर दिया था कि वे अंग्रेजो को युद्ध को समर्थन तब तक नहीं देंगे जब तक भारत को आजादी न मिल जाये। उन्होंने यह भी कह दिया था किउन्हें जितनी व्यक्तिगत हिंसा करना चाहे क्र सकते हे परन्तु वे आंदोलन बंध नहीं करेंगे। उनका मानना था की देश में पूरी सरकारी अराजकता असली अराजकता से भी ज्यादा खतरनाक है।

ब्रिटिश सरकार ने 9 अगस्त 1942 को गांधी जी के साथ कांग्रेस के सभी सभ्यो को एकसाथ मुबंई में गिरफ्तार कर लिया और गांधी जी को पुणे के आंगा खां महल ले जाया गया जहाँ वे 2 साल तक कैदी के रूप में रखा गया। इसी समय 22 फरवरी 1944 को उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी की मृत्यु हो गया और उसके कुछ दिन बाद गांधीजी को मलेरिया हो गया। इसके बाद अंग्रेजो ने उन्हें जरूरी उपचार के लिए 6 मई 1944 को रिहा कर दिया गया।

ब्रिटिशों का भारत छोड़ने का निर्णय (British Decide to Leave India) :

ऐसा लग रहा था की आज़ादी नजदीक है फिर भी “भारत छोड़ो आंदोलन” को भारत में संयोजित कर दिया और द्वितीय विश्व युद्ध के ख़त्म होने तक ब्रिटिश सरकार ने यह स्पस्ट की दिया था की जल्द ही सारी की सारी सत्ता भारतीयों के हाँथ सौपी जाएगी। फिर बाद में गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन पूर्ण कर दिया और ब्रिटिश सरकार ने करीब 1 लाख क्रांतिकारि कैदियों को जेल आज़ाद कर दिया।

भारत छोडो आंदोलन से ब्रिटिश सरकार को यह मालूल हो गया था, कि अब भारत में उनका शासन नहीं चलेगा, उन्हें आज नहीं तो कल या फिर कभी न कभी तो भारत छोड़ कर जाना पड़ेगा। इस तरह गांधीजी ने अपने पुरे जीवनकाल में किये गये सभी आंदोलनों ने देश की आज़ादी में अपना सहयोग दिया।

देश का विभाजन (Partition of the Country) :

भारत की आजादी के तुरंत बाद मोहम्मद अली जिनाह के नेतृत्व में एक ‘अलग मुसलमान देश’ पाकिस्तान की भी मांग की और 1940 के में इस मांग को एक अलग राष्ट्र ‘पाकिस्तान’ के नाम में बदल दिया था। लेकिन गांधी जी को देश का विभाजन नहीं चाहते थे क्योंकि ये उनके धार्मिक एकता और सिद्धांत से पूरा अलग था। परन्तु इसमें गांधीजी कुछ नहीं कर सके और अंग्रेजों ने देश को दो टुकड़ों में बाट दिया।

महात्मा गांधी की मृत्यु (Assassination of Mahatma Gandhi) :

गांधी जी जब 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के ‘बिरला हाउस’ में थे तब शाम के करीब 5:17 बजे एक प्रार्थना सभा में जा रहे थे तब नाथूराम गोडस ने उनके सीने में 3 गोलियां मार दी और उनकी मृत्यु हो गयी। ऐसा माना जाता है की गांधी जी के आखरी शब्द ‘हे राम’ थे जो उनके मुख से निकले थे। बाद में नाथूराम गोडस पर मुकदमा चलाया गया और उसको 1949 में की सजाए मौत सुनाई गयी। Mahatma Gandhi Death

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