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मीराबाई की जीवनी | Meera Bai Biography in Hindi

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Meera Bai Biography In Hindi
Meera Bai
नाम  मीराबाई
जन्म1502
जन्मस्थान  कुडकी, राजस्थान
पिता        रतनसिंह
माता        विरकुमारी
पत्नीमहाराणा कुमार भोजराज
पुत्रमेड़ता
व्यवसायकवियित्री
नागरिकताभारतीय

 

महान संत मीराबाई (Meera Bai Biography in Hindi) :

मीरा बाई एक मध्यकालीन हिन्दू आध्यात्मिक कवियित्री और कृष्ण भक्त थीं। भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित उनके भजन आज भी समग्र भारत में बहुत लोकप्रिय हैं, और श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं। मीराबाई श्री गुरु रविदास की शिष्या थीं, और 200 से 1300 की अवधि के बीच कई भक्ति गीतों, जिन्हें भजन कहा जाता था। भजन और स्तुति की रचनाएँ कर आम जन को भगवान के और समीप पहुँचाने वाले संतों और महात्माओं में मीराबाई का स्थान सबसे ऊपर माना जाता है। Great saint Meera Bai

 

प्रारंभिक जीवन (Meera Bai Early Life) :

मीरा बाई जी का जन्म 1498 के आसपास राजस्थान के कुडकी नामक गाँव में हुआ था। इनका जन्म राठौर राजपूत परिवार में हुआ था। बचपन से ही मीरा कृष्ण की भक्ति में डूबी हुई थी। इनके पिता का नाम रतन सिंह राठोड़ था। उनके पिता एक छोटे से राजपूत रियासत के शासक थे। वे अपनी माता-पिता की इकलौती संतान थीं, और जब वे छोटी बच्ची थीं तभी उनकी माता का निधन हो गया था। Meera Bai Biography in Hindi

 

शिक्षा (Meera Bai Education) :

मीरा बाई को संगीत, धर्म, राजनीति और प्राशासन जैसे विषयों की शिक्षा दी गयी। मीरा का लालन-पालन उनके दादा के देख-रेख में हुआ जो भगवान् विष्णु के बहुत बड़े उपासक थे। इसके साथ ही उन्होंने तीर-तलवार, जैसे- शस्त्र-चालन, घुड़सवारी, रथ-चालन शिक्षा भी पाई। Meera Bai Biography in Hindi

 

विवाह (Meera Bai Marriage) :

मीराबाई का विवाह राणा सांगा के पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोज राज के साथ 1516 में संपन्न हुआ। उनके पति भोज राज दिल्ली सल्तनत के शाशकों के साथ एक संघर्ष में 1518 में घायल हो गए। और इसी कारण 1521 में उनकी मृत्यु हो गयी। उनके पति के मृत्यु के कुछ वर्षों के अन्दर ही उनके पिता और श्वसुर भी मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के साथ युद्ध में मारे गए।

उस समय की प्रचलित प्रथा के अनुसार पति की मृत्यु के बाद मीरा को उनके पति के साथ सती करने का प्रयास किया गया। किन्तु वे इसके लिए तैयार नही हुईं, और धीरे-धीरे वे संसार से विरक्त हो गयीं, और साधु-संतों की संगति में कीर्तन करते हुए, अपना समय व्यतीत करने लगीं।

 

भक्तिमय जीवन (Devotional Life of Saint Meera Bai) :

भगवान कृष्ण के प्रति उनकी भक्ति उनके परिवार को स्वीकार्य नहीं थी। मीराबाई कृष्ण के प्रेम में इतनी मग्न रहती थीं, कि वह अक्सर अपनी जिम्मेदारियों पर ध्यान नहीं दे पाती थीं। यहाँ तक कि मीराबाई ने अपने ससुराल में कुल देवी “देवी दुर्गा” की पूजा करने से भी इंकार कर दिया था। मीराबाई ने सार्वजनिक मंदिरों में जाकर नृत्य किया तथा सभी जाति वर्ग के साथ अपने भगवान की प्रशंसा में गीत भी गाए। Meera Bai Biography in Hindi

मीराबाई का कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गईं। वह जहाँ जाती थीं, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। लोग उनको देवियों के जैसा प्यार और सम्मान देते थे। आज भी पूरे भारत में उनके भावपूर्ण भक्ति गीत गाए जाते हैं।

मीराबाई 16 वीं शताब्दी की भक्ति धारा की संत थीं, जो भक्ति के द्वारा मोक्ष प्राप्त करना चाहती थीं। इस भक्ति धारा के अन्य संत कबीर, गुरु नानक, रामानंद और चैतन्य हैं। मीराबाई ब्राह्मण के उपासकों की सगुण शाखा की अनुयायी थीं। मीराबाई का मानना था, कि मृत्यु के बाद आत्मा और परमात्मा एक में मिल जाएगें। मीराबाई ने कृष्ण को अपने पति, भगवान, प्रेमी और गुरु के रूप में माना।

मीराबाई पर अनेक भक्ति संप्रदाय का प्रभाव था। इसका चित्रण उनकी रचनाओं में दिखता है। मीराबाई की एकमात्र प्रमाणभूत काव्यकृती ‘पदावली’ है। ‘पायो जी मैंने रामरतन धन पायो’ ये मीराबाई की प्रसिद्ध रचना है, ‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर’ ऐसा वो खुदका उल्लेख करती है। भारतीय परंपरा में भगवान् कृष्ण के गुणगान में लिखी गई, हजारों भक्तिपरक कविताओं का सम्बन्ध मीरा के साथ जोड़ा जाता है। Payo Ji Maine Ram Ratan Dhan Payo

मीराबाई की लेखन रचनाएं आध्यात्मिक और प्रेमसंबंधी दोनों थी। मीराबाई को यह दृढ़ विश्वास था, कि अपने पिछले जन्म में वह वृंदावन की गोपियों में से एक थीं, और श्री कृष्ण के प्रेम में व्याकुल थी। गोपियों की तरह उनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य अपने भगवान के साथ आध्यात्मिक और शारीरिक मिलन था। वह अपने इष्टदेव कृष्ण की भावना प्रियतम या पति के रुप में करती थी। उनका मानना था, कि इस संसार में कृष्ण के अलावा कोई पुरुष है ही नहीं।

 

मीरा बाई की हत्या का प्रयास (Attempt to Murder Meera Bai) :

मीरा के लिए आनन्द का माहौल तो तब बना, जब उनके कहने पर राज महल में ही कृष्ण का एक मंदिर बनवा देते हैं। महल में मंदिर बन जाने से भक्ति का ऐसा वातावरण बनता है, कि वहाँ साधु-संतों का आना-जाना शुरू हो जाता है। मीराबाई के देवर राणा विक्रमजीत सिंह को यह सब बुरा लगता है। ऊधा जी भी मीराबाई को समझाते हैं, लेकिन मीरा दीन-दुनिया भूल कर भगवान श्रीकृष्ण में रमती जाती हैं, और वैराग्य धारण कर जोगिया बन जाती हैं। Meera Bai Biography in Hindi

भोजराज के निधन के बाद सिंहासन पर बैठने वाले विक्रमजीत सिंह को मीराबाई का साधु-संतों के साथ उठना-बैठना पसन्द नहीं था। मीराबाई को मारने के कम से कम दो प्रयासों का चित्रण उनकी कविताओं में हुआ है। एक बार फूलों की टोकरी में एक विषेला साँप भेजा गया, लेकिन टोकरी खोलने पर उन्हें कृष्ण की मूर्ति मिली। एक अन्य अवसर पर उन्हें विष का प्याला दिया गया, लेकिन उसे पीकर भी मीराबाई को कोई हानि नहीं पहुँची।

 

मीराबाई के रचित ग्रंथ (Meera Bai Composed Text) :

  • बरसी का मायरा
  • गीत गोविंद टीका
  • राग गोविंद
  • राग सोरठ के पद

 

मृत्यु (Meera Bai Death) :

द्वारका में ‘कृष्ण जन्माष्टमी’ आयोजन की तैयारी चल रही थी। मीराबाई ने कहा कि, वे आयोजन में भाग लेकर चलेंगी। उस दिन उत्सव चल रहा था। भक्तगण भजन में मग्न थे। मीरा नाचते-नाचते श्री रणछोड़राय जी के मन्दिर के गर्भग्रह में प्रवेश कर गईं, और मन्दिर के कपाट बन्द हो गये। जब द्वार खोले गये तो देखा कि मीरा वहाँ नहीं थी। उनका चीर मूर्ति के चारों ओर लिपट गया था। और मूर्ति अत्यन्त प्रकाशित हो रही थी। मीराबाई का शरीर भी कहीं नहीं मिला। जहाँ संवत 1560 में वे भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति में समा गईं।

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