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आचार्य ओशो की जीवनी | Osho Biography in Hindi

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Osho Biography in Hindi
Osho
नाम चन्द्र मोहन जैन
जन्म 11 दिसम्बर 1931
जन्मस्थानकुचवाड़ा ग्राम, रायसेन ज़िला भोपाल, मध्य प्रदेश,
पिताबाबूलाल
मातासरस्वती जैन
व्यवसाय गुरु, दार्शनिक
राष्ट्रीयताभारतीय

 

भारतीय गुरु ओशो (Osho Biography in Hindi) :

ओशो यानी भगवान श्री रजनीश का वास्तविक नाम चंद्र मोहन जैन था। ओशो एक भारतीय रहस्यवादी, गुरु और शिक्षक थे जिन्होंने ध्यान के लिए अध्यात्मिक अभ्यास बनाया था। वे एक विवादित नेता तो हैं पर पुरे विश्व में उनके लाखों अनुयायी हैं और हजारों की तागाद में उनके विरोधी भी थे। वे एक प्रतिभाशाली वक्ता थे और किसी भी प्रकार के विषयों में अपने विचार व्यक्त करने में थोडा भी नहीं झिजकते थे। यहाँ तक की उन्हें रूढ़िवादी समाज द्वारा निषेध भी माना जाता है। Indian Guru Osho

 

प्रारंभिक जीवन (Osho Early Life) :

उनका जन्म चन्द्र मोहन जैन के नाम से 11 दिसम्बर 1931 को कुच्वाडा, मध्यप्रदेश में हुआ था। अपने 11 भाई बहनों में वे सबसे बड़े थे। उनके माता का नाम सरस्वती जैन और पिता का नाम बाबूलाल जैन था। उनके पीर एक कपड़ों के व्यापारी थे। उन्होंने अपना बचपन अपने दादा-दादी के साथ बिताया। Osho Biography in Hindi

ओशो के जन्म के समय एक विचित्र घटना घटी, कहते हैं कि ओशो जन्म के तीन दिनों तक न तो रोये और न अपनी माता का दूध पिया इससे उनके घरवाले चिंतित हो उठे। इसके बाद ओशो के नाना जो ओशो के काफी करीब रहे उन्होंने ओशो की माँ को समझाया की तुम नहाओ और इसके बाद इसे दुसरे कमरे में लेकर जाओ वो तुम्हारा दूध पिएगा और वाकई में ऐसा ही हुआ। इससे ओशो के नाना और ओशो की माँ को अंदाजा हो गया था कि उनके यहाँ पैदा हुआ बच्चा कोई साधारण बच्चा नहीं है।

 

शिक्षा (Osho Education) :

वे जबलपुर के हितकारिणी कॉलेज में पढाई कर रहे थे और उन्होंने एक प्रशिक्षक के साथ बहस किया जिसके कारण उन्हें वहां से निकाल दिया गया। उसके बाद 1955 में उन्होंने डी. एन. जैन कॉलेज से फिलोसोफी में B.A पूरा किया। अपने छात्र जीवन से ही वे लोगों के समक्ष भाषण देना शुरू कर दिया था। उन्होंने बाद में 1957 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ सागर से 21 वर्ष की आयु में फिलोसोफी में M.A डिस्टिंक्शन के साथ साथ पास किया। Osho Biography in Hindi

इसके बाद उन्होंने कुछ सालों तक जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में काम किया। वे छात्रों के बीच “आचार्य रजनीश” के नाम से लोकप्रिय थे। इस दौरान वे सम्पूर्ण भारत में भ्रमण कर आध्यामिक जन-जागरण की एक लहर फैला रहे थे। ओशो ने अपना जीवन का 25 प्रतिशत हिस्सा यात्राओं में गुजरा। उनके क्रांतिकारी प्रवचनों को सुनने के लिए लोगों की भारी भीड़ इकठ्ठी होती थी, उनकी उपस्थिति में एक प्रकार का आकर्षण था जो लोगों को अपनी और खींचने को मजबूर कर देती थी।

 

प्रोफेसर पद से इस्तीफा और भारत भ्रमण (Osho Resignation as Professor and visit India) :

1966 में ओशो ने विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पद से इस्तीफा दे दिया और अपना बाकी का जीवन उन लोगों को समर्पित कर दिया जो स्वयं को जानने और अध्यात्म के गहरे अर्थों से परिचित होना चाहते थे। ओशो का मानना था कि जो अस्तित्व ने जो संबोधि का खजाना उन पर लुटाया है उसके हक़दार वे सब हैं जिन्होनें मनुष्य योनी में जन्म लिया है।

ओशो ने अपने सन्यासियों को “जोरबा दी बुद्धा” की परिभाषा दी, यह एक ऐसा मनुष्य है जो जोरबा की तरह भौतिक जीवन का पूरा आनंद लेना जानता है और वह गौतम बुद्ध की तरह भी गहन मौन में उतरने की कला जानता हैं। जोरबा दी बुद्धा भौतिक और अध्यात्मिक दोनों तरह से समृद्ध व्यक्ति है। वह जीवन को खंड-खंड में ने देखकर उसकी सम्पूर्णता को स्वीकार करता है।

 

श्री रजनीश आश्रम की स्थापना (Osho Establishment of Shri Rajneesh Ashram) :

भारत में भ्रमण करने के बाद ओशो 1970 में रजनीश ने ज्यादातर समय बॉम्बे में अपने शुरुवाती अनुयायीओ के साथ व्यतीत किया था, जो “नव-सन्यासी” के नाम से जाते थे। इस समय में वे ज्यादातर आध्यात्मिक ज्ञान ही देते थे और दुनियाभर के लोग उन्हें रहस्यवादी, दर्शनशास्त्री, धार्मिक गुरु और ऐसे बहुत से नामो से बुलाते थे। Osho Biography in Hindi

1974 को ओशो अपने बहुत से अनुयाइयों के साथ हमेशा के लिए पूना रहने के लिए आ गये और यहाँ “श्री रजनीश आश्रम” की स्थापना की। पूना आने के बाद उनकी लोकप्रियता भारत के साथ-साथ विदेशों में भी बढ़ने लगी। पूना में रहकर ओशो ने अपनी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार जोरों से किया। उन्होंने अपने प्रवचनों में मानव-चेतना के विकास के हर पहलु को उजागर किया। ओशो हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में प्रवचन उपलब्ध है। 1970 के अंत में मोरारी देसाई की जनता पार्टी और उनके अभियान के बीच हुआ विवाद आश्रम के विकास में रूकावट बना।

1981 में वे अमेरिका में अपने कार्यो और गतिविधियों पर ज्यादा ध्यान देने लगे और रजनीश फिर से ऑरेगोन के वास्को काउंटी के रजनीशपुरम में अपनी गतिविधियों को करने लगे। लेकिन फिर वहाँ भी राज्य सरकार और स्थानिक लोगो के मदभेद के चलते उनके आश्रम के निर्माण कार्य को घटाया गया था। 1985 में कुछ गंभीर केसों पर छानबीन की गयी जिनमे 1984 का रजनीश बायोटेरर अटैक और यूनाइटेड स्टेट प्रतिनिधि चार्ल्स एच. टर्नर की हत्या का केस भी शामिल है। इसके बाद अल्फोर्ड दलील सौदे के अनुसार वे यूनाइटेड स्टेट से स्थानांतरित हो चुके थे।

आख़िरकार ओशो पर झूठे आरोप लगाकर अमेरिकी सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और इस दौरान इन्हें पूरे 12 दिनों तक अज्ञातवास में रखा गया। ओशो का इस तरह से जेल में जाना उनके अनुयाइयों के लिए किसी गहरे सदमें से कम नहीं था। इसके बाद यह तय हो गया था कि अब भगवान रजनीश अमेरिका में नहीं रहेंगे।

14 नवम्बर 1985 को ओशो ने अमेरिका छोड़ दिया और इस दौरान ओशो विश्व के अलग-अलग देशों में रहने के उद्देश्य से भ्रमण किया। लेकिन अमेरिकी सरकार के दबाव में 21 देशों ने अपने यहाँ रहने की इजाजत नहीं दी तो कुछ देशों ने ओशो के देश में प्रवेश पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया।

 

भारत आगमन (Osho Arrival in India) :

1987 में ओशो पुन: अपने आश्रम और अपने देश भारत लौट आये, उनका पुणे आश्रम आज “ओशो इंटरनेशनल कम्यून” के नाम से जाना जाता है। भारत पहुंचकर ओशो ने एक बार फिर प्रवचन देना शुरू किया। ओशो अपने प्रवचनों में पाखंडों और मानवता के प्रति होने वाले षड्यंत्रों से पर पर्दा उठाने लगे। Osho Biography in Hindi

इस दौरान भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के बुद्धिजीवियों ने ओशो के प्रति अपने लेखों में गैर-पक्षपातपूर्ण चिंतन अपनाया। अक्सर समाचार पत्रों और मैगजीन में ओशो के लेख प्रकाशित होने लगे। कला वर्ग से जुड़े लोग ओशो आश्रम पुणे में आने लगे। मनुष्यता का चिर-आकांक्षित सपना पूरा होते देखकर लोगों को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं होता था।

26 दिसंबर 1988 में ओशो ने अपने नाम के आगे से “भगवान” शब्द को हटा दिया और आश्रम के बुद्ध सभागार में संध्यां कालीन सत्संग में सभी प्रेमियों ने अपने सद्गुरु को “ओशो” नाम से पुकारने का निर्णय लिया।

इसके बाद ओशो की तबियत बिगड़ने लगी थी, उनका शरीर कमजोर और भीतर से क्षीण होता जा रहा था। इसी दौरान ओशो ने अपने प्रवचनों की संख्या अचानक से बढ़ा दी। ऐसा माना जाता हैं कि शायद ओशो को इस बात का अंदाजा हो गया था कि अब उनके पास ज्यादा वक्त नहीं है।

18 जनवरी 1990 की पुणे आश्रम में रात्रि सत्संग के दौरान उनके निजी चिकित्सक स्वामी प्रेम अमृतो ने सूचना दी कि ओशो के शरीर में दर्द बहुत बढ़ गया इसलिए वे हमारे बीच नहीं आ सकते हैं। लेकिन अपने कमरे में ही सात बजे से हमारे साथ ध्यान में बैठेंगे।

 

मृत्यु (Osho Death) :

ओशो की मृत्यु 19 जनवरी 1990 को हुई। जिसकी घोषणा 19 जनवरी के सांध्य सभा के दौरान की गयी। ओशो की इच्छा थी कि जब वे शरीर छोड़े तो उनके प्रेमी रोयें नहीं दुखी न हो उनकी मृत्यु को एक महोत्सव के रूप में मनाएं। इसी के अनुरूप ओशो के शरीर को उनके पुणे आश्रम के गौतम दि बुद्ध ऑडिटोरियम हॉल में दस मिनिट के लिए रखा गया।

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