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राजा राममोहन राय की जीवनी | Raja Ram Mohan Roy Biography in Hindi

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Raja Ram Mohan Roy Biography In Hindi
Raja Ram Mohan Roy
नाम  राजा राममोहन राय
जन्म 22 मई 1772
जन्मस्थान बंगाल के हूगली जिले के में राधानगर गाँव
पिता  रामकंतो राय
माता  तैरिनी
पत्नीदेवी उमा
पुत्रराधाप्रसाद राय, रामप्रसाद राय
व्यवसायसामाजिक कार्यकर्ता
पुरस्कारअशोक चक्र
नागरिकताभारतीय

 

सामाजिक कार्यकर्ता राजा राममोहन राय (Raja Ram Mohan Roy Biography in Hindi) :

राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत और बंगाल के नवयुग का जनक कहा जाता है। भारतीय सामाजिक और धार्मिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में उनका विशिष्ट स्थान है। 1828 में राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना की थी। वो भारतीय भाषायी प्रेस के प्रवर्तक, जनजागरण और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता तथा बंगाल में नव-जागरण युग के पितामह थे। राजा राममोहन राय एक महान विद्वान और स्वतंत्र विचारक थे।

उन्होंने पारम्परिक हिन्दू परम्पराओं को तोड़ते हुए महिलाओं और समाज के हितों में कई सामाजिक कार्य किए। हालांकि भारत के इतिहास में उनकी पहचान देश में सती प्रथा के विरोध करने वाले प्रथम व्यक्ति के रूप दर्ज है। उन्होंने इंग्लिश, विज्ञान, पश्चिमी औषधि और तंत्रज्ञान की शिक्षा प्राप्त की थी। 1829 में दिल्ली के मुग़ल शासको ने उन्हें “राजा” की उपमा दी थी।

 

राममोहन राय प्रारंभिक जीवन (Raja Ram Mohan Roy Early Life) :

राममोहन का जन्म 22 मई, 1772 को पश्चिम बंगाल के हूगली जिले के में राधानगर गाव में हुआ था। उनके पिता का नाम रामकंतो राय और माता का नाम तैरिनी था। राममोहन का परिवार वैष्णव था, जो कि धर्म सम्बन्धित मामलो में बहुत कट्टर था।

 

राममोहन राय का निजी जीवन (Raja Ram Mohan Roy Married Life) :

उनकी शादी 9 वर्ष की उम्र में ही कर दी गई लेकिन उनकी प्रथम पत्नी का जल्द ही देहांत हो गया। इसके बाद 10 वर्ष की उम्र में उनकी दूसरी शादी की गयी जिसे उनके 2 पुत्र हुए लेकिन 1826 में उस पत्नी का भी देहांत हो गया और इसके बाद उसकी तीसरी पत्नी भी ज्यादा समय जीवित नहीं रह सकी।

 

राममोहन राय की शिक्षा (Raja Ram Mohan Roy Education) :

राजा राममोहन राय ने प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृत और बंगाली भाषा में गाव के स्कूल से ही की। बाद में मदरसा में उन्होंने पर्शियन और अरेबिक भाषा का अभ्यास किया। बाद में हिन्दू साहित्य और संस्कृत का अभ्यास करने वे बनारस गए। वहा उन्होंने वेद और उपनिषद का भी अभ्यास किया। 9 साल की आयु में उन्हें पटना भेजा गया था और 2 साल बाद उन्हें बनारस भेजा गया था। उन्होंने बाइबिल के साथ ही कुरान और अन्य इस्लामिक ग्रन्थों का अध्ययन भी किया।

 

प्रोफेशनल करियर की शुरुआत (Raja Ram Mohan Roy Professional Career) :

उनके पिता की मृत्यु के बाद कलकता मे ही वो जमीदारी का काम देखने लगे, 1805 में ईस्ट इंडिया कंपनी के पदाधिकारी जॉन दिग्बॉय ने उन्हें पश्चिमी सभ्यता और साहित्य से परिचय करवाया।

अगले 10 साल तक उन्होंने दिग्बाय के असिस्टेंट के रूप में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी में काम किया, साथ में उन्होंने 1809 से 1814 तक उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी के रीवेन्यु डिपार्टमेंट में काम किया।

 

वैचारिक क्रान्ति की शुरुआत (Raja Ram Mohan Roy Ideological Revolution) :

1814 में राजा राममोहन राय ने आत्मीय सभा की स्थापना की। वास्तव में आत्मीय सभा का उद्देश्य समाज में सामजिक और धार्मिक मुद्दों पर पुन: विचार कर परिवर्तन करना था।

राममोहन ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कई मुहिम चलाई। जिनमे विधवा विवाह और महिलाओं के जमीन सम्बन्धित हक़ दिलाना उनके मुख्य उद्देश्यों में से एक थे।

उनकी पत्नी के बहिन जब सती हुयी, तो वो बहुत विचलित हो गए थे। इस कारण राममोहन ने सती प्रथा का कठोर विरोध किया। वो बाल विवाह, बहु-विवाह के भी विरोधी थे। उन्होंने शिक्षा को समाज की आवश्यकता माना और महिला शिक्षा के पक्ष में भी कई कार्य किये।

उनका मानना था की इंग्लिश भाषा भारतीय भाषाओं से ज्यादा समृद्ध और उन्नत हैं और उन्होंने सरकारी स्कूलों को संस्कृत के लिए मिलने वाले सरकारी फण्ड का भी विरोध किया। 1822 में उन्होंने इंग्लिश मीडियम स्कूल की स्थापना की।

1828 में राजा राममोहन राय ने ब्रह्म समाज की स्थापना की। इसके द्वारा वो धार्मिक  ढोंगों को और समाज में क्रिश्चेनिटी के बढ़ते प्रभाव को देखना-समझना चाहते थे। Raja Ram Mohan Roy Biography in Hindi

ब्रिटिश राज के चलते उस समय देश बहुत सी सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा था। ऐसे में राजा राममोहन ने समाज के कई क्षेत्रों में अपना योगदान दिया था जिन्हें विस्तार से निम्न मुद्दों के अंतर्गत समझा जा सकता है। 

1830 में राममोहन राय ने मुग़ल साम्राज्य के एम्बेसडर के रूप में यूनाइटेड किंगडम की यात्रा की थी, वे यह देखना चाहते थे की लार्ड बेंटिक ने अपने साम्राज्य में सती प्रथा बंद की या नही। उन्होंने उसी समय फ्रांस की यात्रा भी की थी।

 

सती प्रथा का विरोध (Raja Ram Mohan Roy Sati Pratha Banned) :

राजा राममोहन राय के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी “सती प्रथा को बंद” कराना। उन्होंने ही अपने कठिन प्रयासों से सरकार द्वारा इस कुप्रथा को ग़ैर-क़ानूनी दंण्डनीय घोषित करवाया।

उन्होंने इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध निरन्तर आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन समाचार पत्रों तथा मंच दोनों माध्यमों से चला। इसका विरोध इतना अधिक था कि एक समय पर तो उनका जीवन ही खतरे में था। Raja Ram Mohan Roy Biography in Hindi

राजा राममोहन के अथक प्रयासों से गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक ने इस प्रथा को रोकने में राममोहन की सहायता की। उन्होंने ही बंगाल सती रेगुलेशन या रेगुलेशन 17 ईस्वी 1829 के बंगाल कोड को पास किया, जिसके अनुसार बंगाल में सती प्रथा को क़ानूनी अपराध घोषित किया गया।

1829 में राजा राममोहन राय के सती प्रथा के विरोध में चलाये जाने वाले अभियानों को प्रयासों को सफलता मिली और सती प्रथा पर रोक लगा दी गई। सती प्रथा के मिटने से राजा राममोहन राय समाज सुधारको की श्रेणी में सर्वप्रथम आ गये।

 

उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य (Some Interesting Facts) :

  • 1814 में उन्होंने आत्मीय सभा को आरम्भ किया।
  • 1828 में उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की।
  • 1829 में राजा राममोहन राय के विरोध में सती प्रथा पर रोक लगा दी गई।
  • 1830 में इंग्लैंड जाकर उन्होंने भारतीय शिक्षा के मशाल जलाई।
  • उनके बाद स्वामी विवेकानंद और अन्य विभूतियों ने पश्चिम में भारत का परचम फहराया।
  • 1831 से 1834 तक उन्होंने इंग्लैंड में अपने प्रवासकाल के दौरान ब्रिटिश भारत की प्रशाशनिक पद्दति में सुधर के लिए आन्दोलन किया।
  • ब्रिटिश संसद के द्वारा भारतीय मामलों पर परामर्श लिए जाने वाले वो प्रथम भारतीय थे।

 

मोहन राय को मिले सम्मान (Raja Ram Mohan Roy The honor) :

  • 1829 में दिल्ली के मुगल साम्राज्य द्वारा उन्हें “राजा” की उपाधि दी गयी थी।
  • वो जब उनका प्रतिनिधि बनकर इंगलैंड गए तो वहां के राजा विलियम चतुर्थ ने भी उनका अभिनंदन किया।
  • उनके वेदों और उपनिषद के संस्कृत से हिंदी, इंग्लिश और बंगाली भाषा में अनुवाद के लिए फ्रेंच Societe asiatique ने उन्हें 1824 में सम्मानित भी किया।

 

मृत्यु (Raja Ram Mohan Roy Death) :     

27 सितम्बर 1833 को ब्रिस्टल के पास स्टाप्लेटोन में मेनिंजाईटिस के कारण उनका देहांत हो गया। Raja Ram Mohan Roy Biography in Hindi

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