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जानिए भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का इतिहास | History of Lord Jagannath Rath Yatra

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Jagannath Rath Yatra
Jagannath Rath Yatra

 

जगन्नाथ रथ यात्रा का महत्व (History of Lord Jagannath Rath Yatra)

जगन्नाथ जी की रथ यात्रा हर साल अषाढ़ माह के शुक्त पक्ष के दुसरे दिन (आषाढ़ी बीज) Ashadhi Bij निकाली जाती हैरथ यात्रा का महोत्सव 10 दिन का होता है, जो शुक्ल पक्ष की ग्यारस के दिन समाप्त होता है इस दौरान पूरी में लाखों की संख्या में लोग पहुँचते है, और इस महा आयोजन का हिस्सा बनते हैइस दिन भगवन कृष्ण, उसके भाई बलराम व बहन सुभद्रा को रथों में बैठाकर गुंडीचा मंदिर ले जाया जाता हैतीनों रथों को भव्य रूप से सजाया जाता है, जिसकी तैयारी महीनों पहले से शुरू हो जाती है

भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का अवतार माना गया हैं। जिनकी महिमा का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों एवं पुराणों में भी किया गया हैं। ऐसी मान्यता हैं कि जगन्नाथ रथयात्रा में भगवान श्रीकृष्ण और उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ होता हैं। जो इस रथयात्रा में शामिल होकर रथ को खींचते हैं उन्हें सौ यज्ञ के बराबर पुण्य लाभ मिलता हैं।

 

इस रथ यात्रा से जुड़ी बहुत सी कथाएं है, जिसके कारण इस महोत्सव का आयोजन होता है। रथ यात्रा के अनुसार भिन्न भिन्न कथा हे…

  1. कुछ लोग का मानना है कि कृष्ण की बहन सुभद्रा अपने मायके आती है, और अपने भाइयों से नगर भ्रमण करने की इच्छा व्यक्त करती है, तब कृष्ण बलराम, सुभद्रा के साथ रथ में सवार होकर नगर घुमने जाते है, इसी के बाद से रथ यात्रा का पर्व शुरू हुआ
  2. इसके अलावा कहते है, गुंडीचा मंदिर में स्थित देवी कृष्ण की मासी है, जो तीनों को अपने घर आने का निमंत्रण देती हैश्रीकृष्ण, बलराम सुभद्रा के साथ अपनी मासी के घर 10 दिन के लिए रहने जाते है
  3. श्रीकृष्ण के मामा कंस उन्हें मथुरा बुलाते है, इसके लिए कंस गोकुल में सारथि के साथ रथ भिजवाता हैकृष्ण अपने भाई बहन के साथ रथ में सवार होकर मथुरा जाते है, जिसके बाद से रथ यात्रा पर्व की शुरुवात हुई
  4. कुछ लोग का मानना है कि इस दिन श्री कृष्ण कंस का वध करके बलराम के साथ अपनी प्रजा को दर्शन देने के लिए बलराम के साथ मथुरा में रथ यात्रा करते है
  5. कृष्ण की रानिया रोहिणी से उनकी रासलीला सुनाने को कहती हैमाता रोहिणी को लगता है कि कृष्ण की गोपीयों के साथ रासलीला के बारे सुभद्रा को नहीं सुनना चाहिए, इसलिए वो उसे कृष्ण, बलराम के साथ रथ यात्रा के लिए भेज देती हैतभी वहां नारदजी प्रकट होते है, तीनों को एक साथ देख वे प्रसन्नचित्त हो जाते है, और प्रार्थना करते है कि इन तीनों के ऐसें ही दर्शन हर साल होते रहेउनकी यह प्रार्थना सुन ली जाती है और रथ यात्रा के द्वारा इन तीनों के दर्शन सबको होते रहते है

 

जगन्नाथ रथयात्रा का इतिहास (History of Jagannath Rath Yatra) :

भारत देश के ओडिशा राज्य के तटवर्ती शहर पूरी में भगवान जगन्नाथ का विशाल मंदिर है। जगन्नाथ मंदिर को हिन्दू धर्म में चार धाम से से एक माना गया हैं। यहा हर वर्ष भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली जाती हैं जो भारत ही नहीं वरन विश्व प्रसिद्ध हैं। जगन्नाथपुरी को मुख्यतः पुरी के नाम से जाना जाता हैं। जगन्नाथ रथ उत्सव 10 दिन का होता हैं इस दौरान यहाँ देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। History of Lord Jagannath Rath Yatra

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा देश में एक पर्व की तरह मनाई जाती हैं इसलिए पूरी के अलावा कई जगह यह यात्रा निकाली जाती हैं। रथयात्रा को लेकर कई तरह की मान्यताएं एवं इतिहास हैं। बताया जाता हैं कि एक दिन भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर देखने की चाह रखते हुए भगवान से द्वारका के दर्शन कराने की प्रार्थना की तब भगवान जगन्नाथ ने अपनी बहन को रथ में बैठाकर नगर का भ्रमण करवाया। जिसके बाद से यहाँ हर वर्ष जगन्नाथ रथयात्रा निकाली जाती हैं। History of Lord Jagannath Rath Yatra

 

जगन्नाथ पूरी रथ का पूरा विवरण (How Celebration of Rath Yatra Festival) :

  • इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम एवं बहन सुभद्रा की प्रतिमायें रखी जाती हैं और उन्हें नगर का भ्रमण करवाया जाता हैं।
  • यात्रा के तीनों रथ लकड़ी के बने होते हैं जिन्हें श्रद्धालु खींचकर चलते हैं।
  • भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए लगे होते हैं एवं भाई बलराम के रथ में 14 व बहन सुभद्रा के रथ में 12 पहिए लगे होते हैं।
  • यात्रा का वर्णन स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण, बह्म पुराण आदि में मिलता हैं। इसीलिए यह यात्रा हिन्दू धर्म में काफी खास हैं।
  • भगवान कृष्ण, बलराम और सुभद्रा की प्रतिमा हर 12 साल के बाद बदली जाती है, जो नयी प्रतिमा रहती है वह भी पूरी बनी हुई नहीं रहती है
  • जगन्नाथ पूरी का यह मंदिर एकलौता ऐसा मंदिर है, जहाँ तीन भाई बहन की प्रतिमा एक साथ है, और उनकी पूजा अर्चना की जाती है

 

जगन्नाथ पुरी के रथ यात्रा में तीन रथ निकाले जाते हे इसका विवरण :

जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) का रथ (Chariot of Jagannath) : 

  • यह 45 फीट ऊँचा होता है
  • इसमें 16 पहिये होते है, जिसका व्यास 7 फीट का होता है
  • पुरे रथ को लाल व पीले कपड़े से सजाया जाता है
  • इस रथ की रक्षा गरुड़ करता है
  • इस रथ को दारुका चलाता है
  • रथ में जो झंडा लहराता है, उसे त्रैलोक्यमोहिनी कहते है
  • इसमें चार घोड़े होते है
  • इस रथ में वर्षा, गोबर्धन, कृष्णा, नरसिंघा, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान व रूद्र विराजमान रहते है
  • इसे जिस रस्सी से खींचते है, उसे शंखचुडा नागनी कहते है

 

बलराम का रथ (Chariot of Balaram) :

  • यह 43 फीट ऊँचा होता है
  • इसमें 14 पहिये होते है
  • इसे लाल, नीले, हरे रंग के कपड़े से सजाया जाता है
  • इसकी रक्षा वासुदेव करते है
  • इसे मताली नाम का सारथि चलाता है
  • इसमें गणेश, कार्तिक, सर्वमंगला, प्रलाम्बरी, हटायुध्य, मृत्युंजय, नाताम्वारा, मुक्तेश्वर, शेषदेव विराजमान रहते है
  • इसमें जो झंडा लहराता है, उसे उनानी कहते है
  • इसे जिस रस्सी से खींचते है, उसे बासुकी नागा कहते है

 

सुभद्रा का रथ (Chariot of Subhadra) :

  • यह 42 फीट ऊँचा होता है
  • इसमें 12 पहिये होते है.
  • इसे लाल, काले रंग के कपड़े से सजाया जाता है
  • इस रथ की रक्षा जयदुर्गा करता है
  • इसमें सारथि अर्जुन होता है
  • इसमें नंद्बिक झंडा लहराता है
  • इसमें चंडी, चामुंडा, उग्रतारा, वनदुर्गा, शुलिदुर्गा, वाराही, श्यामकली, मंगला, विमला विराजमान होती है
  • इसे जिस रस्सी से खींचते है, उसे स्वर्णचुडा नागनी कहते है

 

रथ यात्रा उत्सव का सेलिब्रेशन :

रथ यात्रा गुंडीचा मंदिर पहुँचती है, अगले दिन तीनों प्रतिमा को मंदिर में स्थापित किया जाता हैफिर एकादशी तक़ ये वही रहते हैइस दौरान पूरी में मेला भरता है, महाप्रसाद की बितरी होती हैएकादशी के दिन जब इन्हें वापस लाया जाता है, उस दिन वैसे ही भीड़ उमड़ती है, उस दिन को बहुडा कहते हैजगन्नाथ की प्रतिमा अपने मंदिर के गर्भ में स्थापित कर दी जाती है

रथ यात्रा का आयोजन देश विदेश के कई हिस्सों में होता हैभारत देश के कई मंदिरों में कृष्ण जी की प्रतिमा को नगर भ्रमण के लिए निकाला जाता हैविदेश में इस्कोन मंदिर के द्वारा रथ यात्रा का आयोजन होता है100 से भी ज्यादा विदेशी शहरों में इसका आयोजन होता है, जो एक त्यौहार की तरह मनाया जाता हैHistory of Lord Jagannath Rath Yatra

 

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