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चाणक्य के सुविचार हिंदी में | Chanakya Thought in Hindi

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Chanakya Thought

 

चाणक्य के सुविचार (Chanakya Thought in Hindi)

चाणक्य का दिए गए नीति और सिद्धांत ‍सयोंग इसलिए है क्योंकि उनके द्वारा अपने सघन वाचन, अवलोकन और उनके जीवन के अनुभवों द्वारा प्राप्त बहुमूल्य ज्ञान को, सम्पूर्ण स्वार्थहीन होके मनुष्य के कल्याण हेतु से अभिव्यक्त किया है।

आधुनिक समय की सामाजिक आकर, पृथ्वीकी अर्थव्यवस्था और शासन प्रणाली को सही तरीके से बताई गई ‍उनकी नीति और विचार बहोत कारगर बन सकते हैं। चाणक्य की नीतिया के दूसरे प्रकरण से यहाँ कुछ अंश प्रस्तुत किया गया हैं, जो सभी के जीवन में सही कारगत हो सकते है –

 

( 1 ) चाणक्य की पहली निति : जैसे सब पहाड़ो पर मणि नहीं मिल सकती, और सब गजो के ललाट में मोती उत्पन्न नहीं हो सकता, और सब जंगलो में चंदन का पेड़ नहीं हो सकता, वैसे ही जो सज्जन पुरुष (महानुभावो) सब स्थान पर नहीं मिल सकते। Chanakya Thought in Hindi

( 2 ) स्त्रियों का स्वाभाविक दोष जैसे की असत्य बोलना, जल्दबाजी दिखाना, धृष्टता करना, धोखा करना, मूर्खता दिखाना, लालच करना, निष्ठुरता करना और अपवित्र होना – ऊपर के सभी दोषों को चाणक्य स्त्रियों का प्राकृतिक गुण मानते हैं। लेकिन फ़िलहाल इस समय में शिक्षित स्त्रियों में ऐसा अवगुण सही नहीं कहा जा सकता है। Chanakya Suvichar

( 3 ) ये सब सुख लोगो को बहोत महेनत से अर्जित होते हैं जैसे की, आहार के लिए अच्छे पदार्थ का मौजूद होना, भोजन को पचाने की शक्ति का भी होना, स्त्री के साथ मिलन के लिए अच्छी कामशक्ति का होना, पर्याप्त धन के साथ धन देने की इच्छा भी होना जरुरी है।

( 4 ) चाणक्य के विचार के अनुसार जिस व्यक्ति की संतान अपने अंकुश में रहता है, जिसकी पत्नी अपने नियंत्रण में व्यवहार करती है, और अपने द्वारा प्राप्त संपत्ति से पूरी तरह तृप्त रहता है। ऐसे लोगो के लिए इसी संसार में स्वर्ग की अनुभूति होती है। Chanakya Qoutes

( 5 ) चाणक्य के अनुसार वही परिवार सुखी है, जिसकी परिवार की वंशज उनके पिता की आज्ञा का पालन करते है। साथ-साथ पिता का भी कार्य है कि वह अपने संतानो का एकसमान और अच्छी तरह से पालन-पोषण करे। चाणक्य के अनुसार ऐसे मनुष्य से कभी भी दोस्ती नहीं की जा सकती, जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता और वैसे ही ऐसी पत्नी भी अनर्थक है जिससे किसी भी प्रकार का सुख ना मिले।

( 6 ) चाणक्य कहते हैं की जिस दोस्त आपके सामने खुशमादपूर्ण बातें करते है और अपनी पीठ पीछे रहकर आपके सभी कार्य को ख़राब करते हो, ऐसे दोस्त को छोड़ देने में ही मनुष्य की भलाई छुपी हुई है। ऐसे लोग उस बरतन के बराबर है, जिसके ऊपर के भाग में दूध लगा हुआ है लेकिन भीतर से जहर भरा होता है।

( 7 ) जिस तरह अपनी पत्नी के विरह की पीड़ा, अपने भाई और मित्रो से नाराजी की पीड़ा असहनीय होती है, उसी तरह ऋण के निचे दबा मनुष्य भी हरेक क्षण पीड़ा में रहता है। दोषपूर्ण राजा की सेवा में सेवक भी उदास रहता है, और साथ साथ गरीबी का अभिशाप भी व्यक्ति कभी भी भुला नहीं पाते। इस सबसे मनुष्य की अंदर की आत्मा जलती ही रहती है।

( 8 ) चाणक्य के अनुसार : ब्राह्मण समुदाय का आधार है कि वे शास्त्र का ज्ञान ग्रहण करें और उनका बल भी विद्या ही है। राजाओ का कर्म है कि वे सैनिकों माध्यम से अपने शक्ति को अधिक बढ़ाये, राजा का बल भी उनकी सेना ही होती है, वैश्य समुदाय का कर्म है कि वे व्यवसाय करके अपने धन को बढ़ाएँ, और व्यवसाय और धन ही उनका बल है और शूद्र समुदाय का कर्म है की वह लोगों की सेवा करे, इसका बल भी अन्यो की सेवा करना होता है।

आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुए।

( 9 ) चाणक्य के अनुसार युवाकाल में मूर्खता करना बहोत दुःखदायी होता है क्योंकि युवावस्था में मनुष्य कामलोलुपता के लालच में कोई भी मूर्खतापूर्ण कर्म कर देता है। लेकिन मनुष्य के लिए इनसे भी ज्यादा दुःखदायी तब होता है जब दुसरो पर आश्रित रहना पड़े। Chanakya Good Thought

( 10 ) चाणक्य के अनुसार हरेक माता-पिता का कर्म है कि वे अपने संतान को ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिस मार्ग में उनके सर्वश्रेष्ठ स्वभाव की वृद्धि हो सके। क्योकि माता-पिता द्वारा अपने संतान को बचपन में जैसी शिक्षा दी जाती है, वैसा ही उनका विकास उसी प्रकार होता है। ऐसे गुणी संतानो से ही अपनी कुल की प्रतिष्ठा भी बढ़ती है।

( 11 ) चाणक्य कहते है की जिस माता-पिता अपने संतानो को ‍अच्छी शिक्षा नहीं दी। वह अपने संतानो के लिए दुश्मन के समान हैं, क्योंकि निरक्षक बच्चा शिक्षितो के समुदाय में उसी तरह अपमानित होते है जैसे की हंसों के समूह में बगुला की दशा होती है। निरक्षक व्यक्ति बगैर पूछ के पशु जैसे होते है, इसलिए हरेक मातापिता का कर्म है कि वे अपने संतानो को ऐसी शिक्षा दिलवाए की वे सबको सुशोभित कर सके।

( 12 ) चाणक्य निति के अनुसार हरेक मातापिता को अपने संतानो पर बहोत लाड़-प्यार करने से उनमे अनेक दुराचार पैदा हो सकते हैं। इसी के चलते अगर अपनी संतान कोई भी झूठा कर्म करे तो उसे प्रशंसा करने के बजाए उचित यही है की अपने संतान को कभी-कभी डाँटना भी अनिवार्य होता है। Chanakya Thought in Hindi

( 13 ) चाणक्य ने शिक्षा और वाचन के महत्व को सूचित करते हुए कहा है की कोई भी व्यक्ति को मनुष्य का जीवन बहोत कठिनता से मिला होता है, इसलिए मनुष्य को अपने ज्यादातर समय का शास्त्रों के पढाई में और दान करने जैसे भले कार्यों में ही सदुपयोग करना उचित होता है।

( 14 ) चाणक्य के सुविचार के अनुसार बहोत अच्छे शिख : की जो मनुष्य अच्छा दोस्त नहीं है उस पर भरोसा तो करना नहीं चाहिए, लेकिन इसके साथ ही दोस्ती के संबंद में कोई भी भेद भी नहीं खोलने चाहिए, क्योंकि यदि वही दोस्त नाराज हो गए तो आपके जीवन का सारा भेद अन्य के सामने खोल देगा। इसीलिए ऐसे दोस्तों के साथ सतर्कता बहोत जरुरी है।

( 15 ) चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए। Chanakya Niti

( 16 ) चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

( 17 ) चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।

( 18 ) बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

( 19 ) चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है। Chanakya Thought in Hindi

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